बंगाल चुनाव: बलरामपुर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार, आदिवासी-कुड़मी वोटरों पर टिकी नजर

Published by :Ashish Jha
Published at :21 Apr 2026 10:44 AM (IST)
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बंगाल चुनाव: बलरामपुर सीट पर त्रिकोणीय मुकाबले के आसार, आदिवासी-कुड़मी वोटरों पर टिकी नजर

बलरामपुर विधानसभा

Bengal Election: क्या ‘कमल’ खिला पाएगा नया चेहरा या शांतिराम की होगी वापसी यह सवाल बलरामपुर को लेकर हर किसी के दिमाग में है. इन सवालों का उत्तर तलाशती पश्चिम बंगाल के बलरामपुर से लौट कर शचिंद्र कुमार दाश व हिमांशु गोप की यह खास रिपोर्ट

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Bengal Election: पश्चिम बंगाल के जंगलमहल इलाके की सबसे चर्चित सीटों में से एक बलरामपुर विधानसभा इस बार राजनीतिक महासंग्राम का केंद्र बनी हुई है. कभी वामपंथ के अभेद्य दुर्ग के रूप में जानी जाने वाली यह सीट अब भाजपा और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच प्रतिष्ठा की लड़ाई बन गयी है. 2021 के चुनाव में महज 423 वोटों के कांटे के अंतर ने यहां की सियासत को जो मोड़ दिया था, उसकी गूंज इस बार भी साफ सुनायी दे रही है.

टिकट कटा, समीकरण बदला: भाजपा का नया दांव

इस बार का मुकाबला इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि भाजपा ने एक बड़ा राजनीतिक जोखिम उठाया है. पार्टी ने मौजूदा विधायक बनेश्वर महतो का टिकट काटकर जलधर महतो को चुनावी मैदान में उतारा है. वहीं, टीएमसी ने अपने पुराने सिपाही और तीन बार के विधायक शांतिराम महतो पर दांव खेला है. जानकारों का मानना है कि टीएमसी जहां ‘अनुभव’ के दम पर वापसी की उम्मीद कर रही है, वहीं भाजपा ने चेहरा बदलकर ‘एंटी-इन्कंबेंसी’ (सत्ता विरोधी लहर) को काटने की कोशिश की है.

सियासी सफर: लाल किले से भगवा लहर तक

बलरामपुर का इतिहास बड़े उलटफेरों से भरा रहा है. 1977-2006 तक सीपीआइ(एम) का एकछत्र राज रहा. भांडू मांझी यहां के निर्विवाद नेता रहे. 2011 व 2016 में ममता बनर्जी के परिवर्तन की लहर ने वामपंथ को उखाड़ फेंका और टीएमसी ने कब्जा जमाया. वहीं 2021 में भाजपा के बनेश्वर महतो ने पहली बार यहां भगवा फहराकर इतिहास रचा.

जातीय गणित: कुड़मी और आदिवासी वोटर ही ‘किंगमेकर’

बलरामपुर की जीत का रास्ता कुड़मी और आदिवासी समुदायों के मोहल्लों से होकर गुजरता है. करीब 90% ग्रामीण आबादी वाले इस क्षेत्र में सामाजिक पहचान और अस्मिता सबसे बड़ा मुद्दा है. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, जो दल इन दोनों समुदायों के बीच संतुलन बिठाने में सफल होगा, जीत का सेहरा उसी के सिर बंधेगा.

ये हैं मुद्दे : पानी, पलायन और बंद पड़े उद्योग

सियासी दावों के बीच जमीन पर जनता की अपनी समस्याएं हैं. यहां की चुनावी हवा इन तीन बिंदुओं पर टिकी है. ग्रामीण इलाकों में आज भी शुद्ध पेयजल का अभाव एक बड़ी चुनौती है. लाह और क्रेशर उद्योग कभी यहां की अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे. लाह (लाख) और पत्थर क्रेशर उद्योग फिलहाल ठप पड़े हैं. उद्योग बंद होने से युवाओं के पास काम नहीं है, जिससे पलायन यहां की वास्तविकता बन गयी है.

क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति पर एक नजर

यह सीट पुरुलिया लोकसभा के अंतर्गत आती है और सात प्रमुख अंचलों बेला, तेतलों, गोरुआ, उरमा, घाटबेड़ा, दरदा और बलरामपुर में फैली है. यहां का मतदान प्रतिशत अमूमन 80% से अधिक रहता है, जो यह साबित करता है कि यहां का मतदाता खामोश जरूर है, पर सजग है.

इस बार मुकाबला क्यों खास

जहां भाजपा संगठन के दम पर अपनी सीट बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है. वहीं शांतिराम महतो के लिए यह चुनाव उनके राजनीतिक अस्तित्व की पुन: स्थापना की लड़ाई है. सीपीआइ(एम) की मौजूदगी इस मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की क्षमता रखती है, जो किसी भी बड़े दल का खेल बिगाड़ सकती है.

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Ashish Jha

लेखक के बारे में

By Ashish Jha

डिजिटल पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 वर्षों का अनुभव. लगातार कुछ अलग और बेहतर करने के साथ हर दिन कुछ न कुछ सीखने की कोशिश. वर्तमान में बंगाल में कार्यरत. बंगाल की सामाजिक-राजनीतिक नब्ज को टटोलने के लिए प्रयासरत. देश-विदेश की घटनाओं और किस्से-कहानियों में विशेष रुचि. डिजिटल मीडिया के नए ट्रेंड्स, टूल्स और नैरेटिव स्टाइल्स को सीखने की चाहत.

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