सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की हो रही अनदेखी : चंद्रिमा

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वित्त राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) चंद्रिमा भट्टाचार्य ने बुधवार को चुनावी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाये. संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा कि जब कोई संवैधानिक संस्था राजनीतिक बैक ऑफिस की तरह व्यवहार करने लगे, तो लोकतंत्र के लिए यह चिंताजनक स्थिति होती है.

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कोलकाता.

वित्त राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) चंद्रिमा भट्टाचार्य ने बुधवार को चुनावी प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाये. संवाददाताओं से बातचीत में उन्होंने कहा कि जब कोई संवैधानिक संस्था राजनीतिक बैक ऑफिस की तरह व्यवहार करने लगे, तो लोकतंत्र के लिए यह चिंताजनक स्थिति होती है. मंत्री ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग निर्वाचन आयोग, सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पारदर्शिता और विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा है. उनके अनुसार मताधिकार से जुड़े महत्वपूर्ण निर्देश वाट्सएप समूहों के माध्यम से प्रसारित किये जा रहे हैं, जो न तो आधिकारिक तंत्र का हिस्सा हैं और न ही जवाबदेह व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं. चंद्रिमा भट्टाचार्य ने दावा किया कि माइक्रो ऑब्जर्वरों के वाट्सएप ग्रुप में विशेष रोल ऑब्जर्वर सी मुरुगन द्वारा जन्म प्रमाण पत्रों को अस्वीकार करने संबंधी निर्देश दिये गये. उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों में जन्म और मृत्यु पंजीकरण की वैधानिक रजिस्ट्रार होती हैं, ऐसे में कानूनी रूप से मान्य दस्तावेजों को एकतरफा तरीके से खारिज करने का निर्देश मनमाना और अवैध है. उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि माइक्रो ऑब्जर्वरों की भूमिका केवल सहायक की होगी, जबकि वैधानिक अधिकार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों और सहायक निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों के पास है. इसके बावजूद माइक्रो ऑब्जर्वरों को ऐसी भूमिका में धकेला जा रहा है, जिससे मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं.

इस मुद्दे पर तृणमूल कांग्रेस के अन्य नेताओं ने भी प्रतिक्रिया दी है. सांसद महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि आयोग सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद भी भाजपा के निर्देशों पर काम कर रहा है. वहीं, सांसद साकेत गोखले ने कहा कि पूरी प्रक्रिया अनौपचारिक रूप से वाट्सएप के माध्यम से संचालित की जा रही है. तृणमूल नेताओं ने मांग की है कि आयोग तत्काल इन आरोपों पर पारदर्शी स्पष्टीकरण दे और अपनी संवैधानिक स्वतंत्रता को पुनः स्थापित करे.

उनका कहना है कि सार्वजनिक विश्वास किसी भी संवैधानिक संस्था की सबसे बड़ी पूंजी है और उस पर आंच आने से लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होती है. मामले को लेकर सीइओ कार्यालय में भी शिकायत दर्ज करायी गयी है.

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