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सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा का अलख जगाये हुए हैं शिखा

Updated at : 05 Sep 2025 2:39 AM (IST)
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सेवानिवृत्ति के बाद भी शिक्षा का अलख जगाये हुए हैं शिखा

मगरा प्रभावती बालिका विद्यालय की शारीरिक शिक्षा की शिक्षिका शिखा घोष सात वर्ष पूर्व 2018 में सेवा-निवृत्त हो चुकी हैं, लेकिन उनके लिए स्कूल का जीवन यहीं समाप्त नहीं हुआ.

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खेलकूद से नयी पीढ़ी को जोड़ रहीं मगरा की पूर्व शिक्षिका

अब तक 500 से अधिक छात्राओं को दे चुकी हैं प्रशिक्षण

मुरली चौधरी, हुगली

हुगली. मगरा प्रभावती बालिका विद्यालय की शारीरिक शिक्षा की शिक्षिका शिखा घोष सात वर्ष पूर्व 2018 में सेवा-निवृत्त हो चुकी हैं, लेकिन उनके लिए स्कूल का जीवन यहीं समाप्त नहीं हुआ. छात्राओं और अभिभावकों के अनुरोध पर वह आज भी विद्यालय में पढ़ाई के साथ-साथ कबड्डी का प्रशिक्षण दे रही हैं. ऐसे समर्पित शिक्षक को शिक्षक दिवस पर मगरा के लोग सलाम कह रहे हैं. शिखा घोष स्वयं एक बेहतरीन एथलीट और राष्ट्रीय कोच रही हैं. उन्होंने दौड़ और कबड्डी दोनों में कई राष्ट्रीय पदक जीते हैं.

देश की ओर से जापान में आयोजित एशियन एथलेटिक चैंपियनशिप में रिले रेस की दो स्पर्धाओं में स्वर्ण पदक हासिल किया. उन्होंने अपनी छात्राओं को कबड्डी का ऐसा प्रशिक्षण दिया कि विद्यालय की टीम ने स्कूल गेम्स और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक जीतकर विद्यालय का नाम रोशन किया. उनकी देखरेख में कई छात्राओं ने खेलकूद के माध्यम से नौकरी प्राप्त की.

शिखा घोष का जन्म चंदननगर में हुआ. कृष्णभाबिनी नारी शिक्षा मंदिर स्कूल में पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने दौड़ और कबड्डी में पुरस्कार जीतने शुरू कर दिये थे. राष्ट्रीय खेलों से लेकर जापान तक देश का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने सफलता पायी. खेल के बल पर रेलवे में नौकरी का अवसर भी मिला, लेकिन बीएड करने के कारण उसे स्वीकार न कर सकीं. बाद में 1981 में वह मगरा प्रभावती बालिका विद्यालय में शारीरिक शिक्षा की शिक्षिका नियुक्त हुईं. इसके साथ ही उन्होंने राष्ट्रीय कोच की ट्रेनिंग भी ली. अपने शिक्षण जीवन में अब तक 500 से अधिक छात्राओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं. 2018 में सेवानिवृत्ति के बाद भी वह निःशुल्क शिक्षण और प्रशिक्षण जारी रखे हुए हैं.

विद्यालय की प्रधान शिक्षिका महुआ चट्टोपाध्याय ने कहा कि स्कूल की इमारत बनने से पहले से ही शिखा घोष इस विद्यालय से जुड़ी हैं. अनुशासन से लेकर खेलों तक उनकी भूमिका सराहनीय रही है. इसी कारण अभिभावक भी उन्हें छोड़ना नहीं चाहते थे. लगातार सात वर्षों से वह बिना पारिश्रमिक के विद्यालय को सहयोग दे रही हैं. हम चाहते हैं कि भविष्य में वह छात्राओं के लिए कोचिंग सेंटर भी खोलें. वहीं, पूर्व छात्रा लक्ष्मी नायक ने कहा, “मैंने आठवीं कक्षा से शिखा दी से कबड्डी सीखी. अंडर-17 में तीन बार नेशनल खेल चुकी हूं. 2022 में खेलो इंडिया में तीसरा स्थान मिला. यह सब मैडम की वजह से संभव हुआ.” कक्षा 11 की छात्रा संतना दास ने बताया, “मैं छठी कक्षा से मैडम से कबड्डी सीख रही हूं. वह हमें कबड्डी के नये-नये तरीके सिखाती हैं. साथ ही दौड़ और खो-खो में भी प्रशिक्षण देती हैं.”

बता दें कि शिखा घोष अविवाहित हैं और उन्होंने पूरी जिंदगी खेल को ही अपना जीवन माना है. उनकी हमेशा से यही इच्छा रही कि विद्यालय की छात्राएं खेल में उत्कृष्ट हों. चूंचूड़ा-मगरा ब्लॉक में स्कूल गेम्स में कबड्डी शामिल नहीं थी, वहीं से उन्होंने छात्राओं के साथ संघर्ष शुरू किया और सफलता पायी. उन्होंने बताया, “अब तक मेरी स्कूल टीम ने अंडर-14 में सात बार चैंपियनशिप जीती है.

अंडर-17 और अंडर-19 स्तर पर भी छात्राओं ने राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदक हासिल किये हैं. कई छात्राओं ने कबड्डी के जरिए नौकरी भी पायी है. सेवानिवृत्ति के बाद भी मैं रोज स्कूल आती हूं और छात्राओं को प्रोत्साहित करती हूं. जरूरत पड़ने पर उनके परिवार से भी बात करती हूं. अब भी मैं तीन समूहों के साथ अभ्यास करा रही हूं. जब तक संभव है, जारी रखूंगी. मेरी इच्छा है कि लड़कियां खेल में अच्छा करें.”

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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AKHILESH KUMAR SINGH

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