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रैपिडो व ओला की पहली लेडी बाइकर हैं रूपा चाैधरी

बाइक चला कर यात्रियों को गंतव्य स्थल तक पहुंचाना मेरा जुनून है, रोजगार का जरिया भी : रूपा कोलकाता : आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो बाइक क्यों नहीं चला सकती. बाइक चलाना कोई कठिन काम नहीं है, लेकिन इसको प्रोफेशन के रूप में चुनना एक बहुत बड़ी चुनाैती है. ओला […]

बाइक चला कर यात्रियों को गंतव्य स्थल तक पहुंचाना मेरा जुनून है, रोजगार का जरिया भी : रूपा

कोलकाता : आज महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो बाइक क्यों नहीं चला सकती. बाइक चलाना कोई कठिन काम नहीं है, लेकिन इसको प्रोफेशन के रूप में चुनना एक बहुत बड़ी चुनाैती है. ओला की तरह लोग रैपिडो (बाइक) की भी बुकिंग करके जल्द से जल्द अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहते हैं. ज्यादातर इलाकों में लड़के ही रैपिडो एप की बुकिंग से बाइक पर लोगों को ले जाते हैं. लड़की बाइक चला कर सवारी को पहुंचाये, तो लोग थोड़ा चाैंक जाते हैं, इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता.
अपने प्रोफेशन पर मुझे गर्व है. ऐसा जज्बा व्यक्त कर रही हैं, रैपिडो व ओला एप की पहली लेडी बाइकर रूपा चाैधरी. 32 साल की यह पहली लेडी बाइकर (कोलकाता) रूपा का कहना है कि काम कोई भी छोटा नहीं है, अगर दिल से किया जाये तो उसमें बहुत आनंद आता है. मैं भी अपने काम को बहुत एंज्वॉय करती हूं. सबसे बड़ी बात यह है कि यही मेरा पैशन भी है व रोजगार के साथ जीने का साधन भी है. अलग-अलग तरह के लोगों से मिलने का माैका मिलता है. रैपिडो या ओल में बुकिंग होने के बाद जब मैं बाइक चलाती हूं तो अपने मार्ग की ओर ही एकाग्र होती हूं.
इस बात से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरी बाइक पर महिला है या पुरुष. जैसे ही एप के जरिये लोग बुकिंग करते हैं, वह सवारी को उनके गंतव्य तक पहुंचा देती हैं. गूगल मैप के जरिये उसकी बाइक महानगर के सभी रास्तों पर दाैड़ती जाती है. यह मेरा प्रोफेशन है. मैं चाहती हूं कि और भी लड़कियां इसमें प्रशिक्षण लेकर आगे आयें व इस काम के जरिये आत्मनिर्भर बनें. मुझे देखकर कुछ अन्य लड़कियां भी बाइकर बनने के लिए अब मोटीवेट हो रही हैं.
संघर्ष से मिला जीने का मकसद
सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग ले रही इस लेडी बाइकर का कहना है कि बाइक तो बहुत पहले ही सीख लिया था. अब वह फोर व्हीलर भी सीख रही है, ताकि ओला, उबेर की गाड़ियां भी चलासकें. महिलाएं लेडी ड्राइवर के साथ ज्यादा कम्फर्ट फील करती हैं. फिलहाल इस काम से उसे लगभग 15,000 रुपये की आमदनी हो जाती है.
हालांकि वह केवल उच्च माध्यमिक तक पढ़ी हैं. वह बताती है कि जीवन में कई बार चुनाैतियां व परीक्षा की घड़ी होती है, लेकिन जब हम मुश्किलों का सामना डट कर करते हैं तो आशा व रोशनी का नया मार्ग जरूर खुल जाता है. 2018 में पापा के बीमार होने के बाद ही उसने काम करना शुरु कर दिया. पिताजी जनवरी, 2019 में दुनिया से चले गये. मां तो पहले ही चली गयी.
एक बहन थी, उसने भी साथ हमेशा के लिए छोड़ दिया. वह एक बच्चे की मां भी है लेकिन वैवाहिक जीवन में भी अभी विवाद चल रहा है. संघर्ष तो है लेकिन इन परिस्थितियों ने ही मुझे जीने का हाैसला दिया है. मैं चाहती हूं, हर महिला अपने पैरों पर खड़ी रहे. चाहे वह कम पढ़ी-लिखी ही क्यों न हो, वह अपने आत्मविश्वास के साथ हिम्मत करे तो जरूर लक्ष्य तक पहुंच सकती है.
Prabhat Khabar Digital Desk
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