गांधीजी के कोलकाता से चंपारण प्रस्थान के शतवार्षिकी कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में बोले राज्यपाल केशरीनाथ
कोलकाता : नींव के पत्थर इमारतों का बोझ सहते हैं, पर स्वर उनकी कराहों के कभी नहीं उभरते हैं. इतिहास कैसे बनता है, उसका प्रेरक तत्व कौन होता है, उसकी चर्चा कम ही होती है.
इतिहास के पन्नों में दबी ऐसी विभूतियों का आकलन तब होता है, जब उनका उल्लेख हो पाता है. बिहार के बाहर कम लोग ही पंडित राजकुमार शुक्ल को जानते होंगे, लेकिन कभी-कभी परिणाम तो उद्गम की ओर ले ही जाता है. मेरा मानना है कि पंडित राजकुमार शुक्ल चंपारण आंदोलन के बीज पुरुष थे. वह चंपारण के निलहे किसानों के आंदोलन के आदि स्वर थे. महात्मा गांधी ने उनके मन की कराह को सुना और चल पड़े किसानों की आवाज बनने.
महात्मा गांधी के कोलकाता से चंपारण प्रस्थान के शतवार्षिकी समारोह का उद्घाटन के बाद कलाकुंज में अपने संबोधन में उक्त बातें राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने कहीं.
उन्होंने कहा कि चंपारण के पंडित राजकुमार शुक्ल के बार-बार के आग्रह पर महात्मा गांधी 8 अप्रैल 1917 को बंगाल की धरती से चंपारण के लिए रवाना हुए. अंग्रेजी अत्याचार के विरुद्ध राजकुमार शुक्ल 1914 से ही आंदोलन चला रहे थे, लेकिन 1917 में गांधीजी के सशक्त हस्तक्षेप ने वह आंदोलन व्यापक जन आंदोलन का रूप ले लिया.
डॉ राजेंद्र प्रसाद, ब्रजकिशोर प्रसाद, आचार्य कृपलानी जैसे मनीषियों का चंपारण डेरा बना. आंदोलन की अनूठी प्रवृत्ति के कारण इसे राष्ट्रीय बनाने में गांधीजी सफल रहे. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में चंपारण के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता है.
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के 1917 में संचालित चंपारण सत्याग्रह न सिर्फ भारतीय इतिहास बल्कि विश्व इतिहास की एक ऐसी घटना है, जिसने ब्रिटिश साम्राज्यवाद को खुली चुनौती दी थी.
चंपारण आंदोलन में गांधीजी के कुशल नेतृत्व से प्रभावित होकर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उन्हें महात्मा के नाम से संबोधित किया और मोहनदास करमचंद गांधी महात्मा गांधी बन गये. चंपारण से ही मोहनदास करमचंद गांधी का महात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त हुआ.
राज्यपाल ने भितिहरवा आश्रम जीवन कौशल ट्रस्ट के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि भितिहरवा आश्रम जीवन कौशल ट्रस्ट द्वारा गांधी के कोलकाता से चंपारण प्रस्थान के शतवार्षिकी समारोह का आयोजन एक सराहनीय कार्य है. ट्रस्ट के इस प्रयास से नयी पीढ़ी को गांधी और कस्तूरबा के साथ पंडित राजकुमार शुक्ल के बारे में जानकारी प्राप्त होगी. साथ ही आदर्श की अकाल बेला में उन्हें अपना आदर्श चुनने का विकल्प मिलेगा.
राज्यपाल ने ‘जुल्म की इंतेहा होगी, तो होगी बगावत और मुखालफत मुल्क की होगी तो अदावत होगी’ शेर प्रस्तुत किया, तो कलाकुंज हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. उन्होंने कहा कि अत्याचार जब बढ़ता है, तो बगावत के सुर उठते हैं, जिसका नजारा सारी दुनिया ने चम्पारण सत्याग्रह में देखा.
राज्यपाल ने कहा कि टेलीफिल्म एक सार्थक प्रयास है. मैं ट्रस्ट के शैलेंद्र प्रताप सिंह, डॉ ज्ञानदेव मणि त्रिपाठी और राकेश रंजन राव को धन्यवाद देता हूं कि उन्होंने इस महती कार्य को अपने हाथों में लिया है. टेलीफिल्म के निर्देशक अरुण पाहवा और कलाकारों को भी मेरी शुभकामनाएं हैं.
मंचस्थ पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र ने कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में कहा : मेरा विश्वास है कि गांधीजी की तरफ ही पंडित राजकुमार शुक्ल भी आध्यात्म के पथ के पथिक थे, तभी तो उन्होंने पौरुषवान सत्याग्रही के रूप में लोक की वेदना के साथ गांधी की संवेदना को जोड़ने का उपक्रम किया. ऐसा करके उन्होंने इतिहास रचा है.
चंपारण के पंडित शुक्ल अपने दुख से दुखी नहीं थे, बल्कि उन्होंने समष्ठी के दुख को अपना दुख माना. किसानों की पीड़ा ने उन्हें इतना व्यग्र किया कि वह इसका समाधान की खोज में लग गये. गांधी के प्रति उन्हें आस्था और विश्वास था कि गांधीजी ही किसानों की पीड़ा हर सकते हैं. गांधीजी को चंपारण ले जाने के लिए उन्होंने कई बार प्रयास किया था. पंडित शुक्ल ने इसी कोलकाता में गांधीजी को बिहार के चंपारण जाने के लिए तैयार किया और ले भी गये.
डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र ने कहा शुक्ल ने कोलकाता में जिस समय गांधीजी को कोलकाता ले जाने के तैयार किया उस मुहूर्त को मैं सत्-सत् प्रणाम करता हूं. यहीं से गांधीजी महात्मा के रूप में देश के सामने स्थापित हुए.
शुक्लजी के अंदर लोक कल्याण की बेचैनी थी. उन्होंने एक ऐसी फैज तैयार किया जिसने चंपारण के किसानों को एक नई ऊर्जा दी. पंडित शुक्ल के बारे में कम ही लोग जानते हैं, लेकिन उन्होंने गांधीजी को बिहार के चंपारण की धरती पर लाकर कितना महत्व का कार्य किया था.
इसको कम ही लोग जानते हैं, लेकिन आज वही बिहार की क्या दशा है. जयप्रकाश की सेना आज कहां है. वह कितनी दिग्भ्रमित है और वह अपनी धरती को कहां पहुंचा रहे हैं. इन सवालों को गंभीरता से सोचने की आवश्याकता है. राजनीति का विकल्प खोजने की आवश्यकता है. मेरा मानना है कि आध्यात्म के बगैर इस देश का कल्याण नहीं हो सकता है.
विशिष्ट अतिथि के तौर पर अपने संबोधन में सांसद व वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश ने कहा : भितिहरवा आश्रम जीवन कौशल ट्रस्ट के कर्ताधर्ता शैलेंद्र प्रताप सिंह व पदाधिकारियों के प्रति अपना आभार प्रकट करता चाहता हूं, जिन्होंने इस तरह के कार्यक्रम के आयोजन करके उस ऐतिहासिक घटना को कोलकाता में पुनर्जीवित किया. जब इतिहास का वह पन्ना धुंधला पड़ रहा है, जिसने देश को नयी पहचान, नयी दिशा और गरिमा प्रदान किया.
आज के दिन ही राजकुमार शुक्ल गांंधीजी को लेकर कोलकाता से चंपारण की तरफ प्रस्थान किये और उस एक प्रसंग ने देश के ही नहीं, बल्कि दुनिया के इतिहास को प्रभावित किया. इतिहास ही वह रोशनी है, जिससे हम अतीत को देख सकते हैं और उससे सबक लेकर भविष्य के लिए रास्ता बना सकते हैं.
आज की समस्याओं का समाधान हम अपने इतिहास के प्रेरक प्रसंगों से प्रेरणा लेकर कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि दबे हुए गरीब किसानों की मुक्ति के लिए जो मशाल गांधीजी ने जलाया, उसके प्रेरक तत्व तो राजकुमार शुक्ल ही थे. चंपारण आंदोलन की मशाल ने ही देश के स्वतंत्रता संग्राम को हवा दी.
भितिहरवा आश्रम जीवन कौशल ट्रस्ट के अध्यक्ष शैलेंद्र प्रताप सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि भितिहरवा आश्रम जीवन कौशल ट्रस्ट द्वारा पंडित शुक्ल द्वारा गांधीजी को कोलकाता से बिहार के चंपारण ले जाने की ऐसिहासिक घटना के सौ वर्ष पूरे होने पर इस कार्यक्रम का आयोजन किया है.
ट्रस्ट द्वारा इसका आयोजन देशभर में किया जायेगा. ऐसा करके हम देश के युवाओं को इस ऐतिहासिक घटना से अवगत करना चाहते हैं. गांधी जी और राजकुमार शुक्ल के इस महान कार्य को देश के सामने रखना है.
संयोजक राज दत्त पांडेय ने कहा कि चंपारण सत्याग्रह आज के संदर्भ में भी प्रासंगिक है. बहुभाषी, बहुवर्गीय, कृषक समाज वाले इस देश के लिए क्या उपयोगी शिक्षा हो सकती है और सामाजिक रूपांतरण के लिए कौन सा टिकाऊ मॉडल हो सकता है. इसकी आधारशिला गांधीजी ने चंपारण में ही रखी थी.
कार्यक्रम के अंत में चंपारण सत्याग्रह पर आधारित डॉक्यू ड्रामा ‘नीले रंग की लाल कहानी’ का प्रदर्शन भी किया गया. साथ ही राजभाषा विभाग की डॉ सविता सिंह ने गांधीजी के कई प्रिय गीतों को प्रस्तुत किया.
