मुड़ी मेला बना आस्था और परंपरा का केंद्र
Published by :GANESH MAHTO
Published at :19 Jan 2026 12:54 AM (IST)
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मकर संक्रांति के बाद से चौबीस पहर नाम संकीर्तन चलता है और चौथे दिन धुलट के साथ मुड़ी मेला लगता है.
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बांकुड़ा. बांकुड़ा जिले के अनेक उत्सव, त्योहार और मेलों में केनजाकूड़ा का मुड़ी मेला अपनी विशिष्ट परंपरा और बढ़ती लोकप्रियता के कारण खास पहचान बना चुका है. बांकुड़ा शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर द्वारकेश्वर नदी के तट पर स्थित केनजाकूड़ा ग्राम में हर वर्ष बांग्ला तारीख के चौथे माघ को इस मेले का आयोजन होता है. मकर संक्रांति के बाद से चौबीस पहर नाम संकीर्तन चलता है और चौथे दिन धुलट के साथ मुड़ी मेला लगता है.
परंपरा से मेले तक का सफर
स्थानीय लोगों के अनुसार पहले श्रद्धालु नाम संकीर्तन सुनने आते थे और चौथे दिन नदी किनारे बैठकर मुड़ी खाकर लौट जाते थे. इसी परंपरा ने धीरे-धीरे मुड़ी मेले का रूप ले लिया. लोग अपने घर से मुड़ी, चाप, समोसा, नमकीन, प्याज, खीरा, मूली और हरी मिर्च साथ लाते हैं और नदी किनारे बैठकर भोजन का आनंद लेते हैं. पानी के लिए नदी की बालू हटाकर जल निकालने की परंपरा भी यहां देखने को मिलती है.श्रद्धा और सामाजिक समागम
नदी किनारे संजीवनी माता का आश्रम स्थित है, जहां दर्शन के बाद श्रद्धालु मुड़ी मेले का आनंद लेते हैं. अब मेले की देखरेख केनजाकूड़ा संजीवनी माता आश्रम जनकल्याण समिति की ओर से की जाती है. समिति की तरफ से संजीवनी माता के प्रसाद के रूप में खिचड़ी भोग का वितरण भी किया जाता है.डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है
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