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दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं बांकुड़ा के ढाकी कलाकार

Updated at : 08 Oct 2025 11:13 PM (IST)
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दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं बांकुड़ा के ढाकी कलाकार

छतना प्रखंड के कुलारा गांव, जिसे ‘ढाकियों का गांव’ कहा जाता है, में लगभग 90 परिवार हैं जिनका कोई न कोई सदस्य ढाक बजाने के पेशे से जुड़ा है.

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स्थानीय स्तर पर न सम्मान न आमदनी, पूजा के मौसम में दिल्ली-बेंगलुरू तक ढाक बजाने जाते हैं कलाकार

प्रणव कुमार बैरागी, बांकुड़ा

जिले के ढाकी कलाकारों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर उन्हें न तो पर्याप्त आमदनी होती है और न ही सम्मान मिलता है, जिसके कारण वे आजीविका के लिए दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं. छतना प्रखंड के कुलारा गांव, जिसे ‘ढाकियों का गांव’ कहा जाता है, में लगभग 90 परिवार हैं जिनका कोई न कोई सदस्य ढाक बजाने के पेशे से जुड़ा है. ढाकियों का गांव, मगर आय सीमित कुलारा के ढाक वादकों का कहना है कि जिले में साल भर विभिन्न कार्यक्रमों, जुलूसों और सभाओं में वे ढाक बजाते हैं, लेकिन अधिकांश मामलों में उन्हें इसके लिए भुगतान नहीं किया जाता. उनका कहना है कि ढाक बजाकर ही उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करना पड़ता है, फिर भी सरकार की किसी जनसंपर्क योजना में उन्हें जगह नहीं मिलती. कलाकारों ने बताया कि राज्य सरकार के शुरुआती वर्षों में उन्हें पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग और बीडीओ कार्यालयों में प्रचार कार्यों के लिए नियुक्त किया गया था, पर कुछ साल बाद यह अवसर भी खत्म हो गया.

पूजा के मौसम में होते हैं पलायन को मजबूर : कुलारा, ओंदा और गंगाजलघाटी के ढाकियों के अनुसार, हर साल 21 से 22 ढाक वादकों का समूह दिल्ली, बैंगलोर, चेन्नई, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में शारदीय उत्सवों के दौरान ढाक बजाने जाता है. वे बताते हैं कि वहां बेहतर मेहनताना, उपहार और सम्मान मिलता है, जबकि अपने ही राज्य में उन्हें यह सब नसीब नहीं. ढाक कलाकार महादेव कालिंदी, संतोष कालिंदी, भीम कालिंदी, अनंत कालिंदी और श्रीकांत कालिंदी ने कहा कि वे 25 वर्षों से ढाक बजा रहे हैं, पर राज्य सरकार से कोई सहायता या कलाकार भत्ता नहीं मिला.

उनका कहना है कि पूजा का समय उनके लिए खुशी और गम दोनों लेकर आता है-एक ओर अच्छा सम्मान और आमदनी, तो दूसरी ओर परिवार से दूर रहने का दर्द. दिवाली के दौरान उन्हें कई जगहों से बुलावे मिलते हैं, लेकिन स्थानीय आयोजनों में काम के अवसर बहुत कम हैं. यही कारण है कि बांकुड़ा के ढाकी कलाकार आज भी दूसरे राज्यों पर निर्भर हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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