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कराली पहाड़ी मां काली : 300 वर्ष पुरानी आस्था का जीवंत केंद्र

Updated at : 16 Oct 2025 10:31 PM (IST)
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कराली पहाड़ी मां काली : 300 वर्ष पुरानी आस्था का जीवंत केंद्र

जहां अमावस की रात अपने भक्तों में लीन हो जाती हैं कराल काली

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जहां अमावस की रात अपने भक्तों में लीन हो जाती हैं कराल काली हंसराज सिंह, पुरुलिया जिले के बांदवान प्रखंड क्षेत्र के महेश से लगभग 3.5 किलोमीटर दूर, कराली पहाड़ी की 300 मीटर ऊंची चोटी पर विराजित हैं मां कराल काली. कार्तिक अमावस्या की रात यहां श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ पड़ता है. कोई दर्शन करने, तो कोई शीश नवाने और कोई मां की अलौकिक अदभुत उपस्थिति को महसूस करने के वास्ते इस पहाड़ी तक खिंचा चला आता है. 300 साल पुरानी परंपरा: स्थानीय लोगों का कहना है कि मां कराल काली अत्यंत जाग्रत हैं. जो भी सच्चे मन से यहां मुरादें मांगता है, वह कभी खाली हाथ नहीं लौटता. स्थानीय पुजारी प्रशांत मुखोपाध्याय बताते हैं कि यह पूजा 300 वर्ष से भी अधिक पुरानी है और आज भी विधिपूर्वक संपन्न की जाती है. गांववालों की मान्यता है कि पुराने समय में जब किसी की बैलगाड़ी रास्ते में टूट जाती, तो मां का नाम लेते ही वह चल पड़ती थी. कई श्रद्धालु बताते हैं कि श्रावण माह के एक सोमवार को मंदिर में एक सांप मां के चरणों में घंटों शांत बैठा रहता है और भक्त आकर उसे श्रद्धा से पूजते हैं. आस्था, रहस्य व रोमांच का संगम: कराली पहाड़ी सिर्फ पूजा का स्थान नहीं, बल्कि आस्था व लोक-विश्वास की जीवंत विरासत है. यहां हर अमावस्या नये अनुभवों व कथाओं के साथ बीत जाती है. कराली पहाड़ी पर स्थित गुफा के बारे में कहा जाता है कि एक समय यहां एक बाघिन रहती थी, परंतु पूजा के समय वह कभी दिखती नहीं थी. श्रद्धालुओं के अनुसार, यह भी मां कराल काली की ही कृपा थी, जिससे लोग निडर होकर चढ़ाई कर मां काली के दरबार में पहुंच पाते थे. मां के दर्शन की कथा और भाईफोटा मेला प्रशांत मुखोपाध्याय एक घटना का उल्लेख करते हैं – लगभग आठ वर्ष पहले अमावस्या के अगले दिन पूजा के समय एक किशोरी प्रसाद लेने आयी थी. बाद में पता चला कि वहां कोई लड़की गयी ही नहीं थी. तब सभी ने माना कि मां स्वयं अपने भक्तों को दर्शन देने आयी थीं. कार्तिक अमावस्या के अगले दिन यहां भाईफोटा (भातृ द्वितीया) के अवसर पर विशाल मेला लगता है. क्षेत्र के निवासी सुखेन महतो के अनुसार, यह मेला पूर्वजों के समय से चला आ रहा है. मां की पूजा, प्रसाद, और अनगिनत लोककथाएं हर साल दोहरायी जाती हैं. पड़ोसी राज्य झारखंड और आसपास के जिलों से हजारों लोग इस पर्व में भाग लेने आते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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SANDIP TIWARI

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By SANDIP TIWARI

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