दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण कार्य तेजी पर

Updated at : 02 Oct 2018 6:04 AM (IST)
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दुर्गा प्रतिमाओं का निर्माण कार्य तेजी पर

सांकतोड़िया : राज्य में दुर्गोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है. पूजा से छह माह पहले से ही पंडाल और मूर्ति बनाने का काम आरंभ हो जाता है. मूर्त्तिकार दुलाल पाल के अनुसार अप्रैल में प्रतिमा निर्माण के लिए बांस, लकड़ी, रस्सी और पुआल का कार्य शुरू हो जाता है. बाद में मिट्टी और रंग-रोगन का […]

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सांकतोड़िया : राज्य में दुर्गोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है. पूजा से छह माह पहले से ही पंडाल और मूर्ति बनाने का काम आरंभ हो जाता है.
मूर्त्तिकार दुलाल पाल के अनुसार अप्रैल में प्रतिमा निर्माण के लिए बांस, लकड़ी, रस्सी और पुआल का कार्य शुरू हो जाता है. बाद में मिट्टी और रंग-रोगन का काम होता है. मेदिनीपुर से बांस और डायमंड हार्बर की मिट्टी मंगाई जाती है.
कुछ मूर्त्तिकार नवदीप से भी मिट्टी खरीदते हैं. एक ट्रक मिट्टी की कीमत 25 से 30 हजार रूपये तक होती है. यह मिट्टी गंगा के किनारे की होती है. वेश्यालय की मिट्टी के उपयोग की बात को वे पूरी तरह से खारिज कर देते हैं. उनका मानना है कि गंगा की चिकनी मिट्टी उसी जगह से ली जाती है, जहां वेश्याएं स्नान करती हैं. स्थानीय पीली मिट्टी का भी उपयोग किया जाता है.
दस हजार से तीन लाख रुपये तक की प्रतिमाएं होती हैं. महंगी प्रतिमाओं के निर्माण का ऑर्डर पहले लिया जाता है. इस वर्ष सबसे महंगी प्रतिमा का ऑर्डर उन्हें बिहारशरीफ (बिहार) की दुर्गापूजा कमेटी से मिली है. प्रतिमा की कुल लागत तीन लाख रुपये है.
उन्होने कहा कि बंगाल समेत झारखंड तथा बिहार तक यहां से बनायी गई प्रतिमाएं जाती हैं. आसनसोल और बिहार के नालंदा, बिहारशरीफ की पूजा कमेटियां यहां से प्रतिमाएं ले जाती हैं. वर्तमान समय मे फैशनेबल और डिजाइनदार प्रतिमाओं की अधिक मांग है. पहले प्रतिमाओं में कपड़ा और बाहरी सजावट सामानों का उपयोग किया जाता है, लेकिन अब इनका उपयोग नहीं होता.
मिट्टी के ढांचे और हाथ की कलाकारी से ही इन्हें सजाया जाता है. अजंता डिजाइन अत्यधिक पसंद की जा रही हैं. थीम आधारित प्रतिमाओं की भी मांग बढ़ रही है. धनसार पूजा कमेटी ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वृक्ष बचाओ की थीम पर प्रतिमा निर्माण का आर्डर दिया है.
कुछ कलाकार पूजा स्थल पर भी जाकर सामान्य या थीम आधारित प्रतिमाएं बनाते हैं. प्रतिमा निर्माण की शुरूआत उनके पिता स्व. सीतानाथ पाल ने वर्ष 1947 से शुरू की थी. पिताजी के साथ वे भी इसी में रम गए और इनके दोनों पुत्र अभिषेक और अभिजीत भी सहयोग कर रहे हैं. उनका मानना है कि दिन प्रतिदिन प्रतिमा निर्माण का खर्च बढ़ रहा है. इससे ज्यादा दिन तक लगाव रख पाना संभव नहीं है.
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