बाबुल सुप्रियो: बॉलीवुड से राजनीति तक का सफर, पढ़े, प्रभातखबर के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत

Updated at : 20 Jun 2014 1:56 PM (IST)
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बाबुल सुप्रियो: बॉलीवुड से राजनीति तक का सफर, पढ़े, प्रभातखबर के साथ एक्सक्लूसिव बातचीत

जब तक जीवन है तब तक संघर्ष है. लेकिन संघर्ष के डर से हार कभी नहीं मानना चाहिए. मकसद बस अच्छा होना चाहिए. जब आप आगे बढ़ेंगे तो कई मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा, कई बाधाएं खड़ी की जायेंगी लेकिन हौसला न टूटे और बस आगे बढ़ते रहना चाहिए. यह बात बॉलीवुड से राजनीति का […]

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जब तक जीवन है तब तक संघर्ष है. लेकिन संघर्ष के डर से हार कभी नहीं मानना चाहिए. मकसद बस अच्छा होना चाहिए. जब आप आगे बढ़ेंगे तो कई मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा, कई बाधाएं खड़ी की जायेंगी लेकिन हौसला न टूटे और बस आगे बढ़ते रहना चाहिए. यह बात बॉलीवुड से राजनीति का सफर करने वाले मशहूर गायक व मौजूदा सांसद बाबुल सुप्रियो का मानना है.

गायन से राजनीति की ओर कदम रखने के दौरान उन्हें कई दिक्कतों व बाधाओं का सामना करना पड़ा लेकिन जनता ने उन्हें अपना जन प्रतिनिधि चुना. इस बार लोकसभा चुनाव में आसनसोल सीट के लिए भाजपा ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया. काफी कांटे की टक्कर के बावजूद सुप्रियो ने करीब 74,000 वोटों के अंतर से जीत हासिल की. बॉलीवुड से राजनीति के सफर का अनुभव व जनता के लिए कार्यों की अगली योजना जैसे मुद्दों को लेकर सांसद बाबुल सुप्रियो से प्रभात खबर के संवाददाता अमित शर्मा की खास बातचीत हुई. आइये जानते हैं उन बातचीत के प्रमुख अंश :

नहीं टूटा कभी हौसला :

बॉलीवुड के गानों से मैं लोगों के करीब आया लेकिन राजनीति ने मुझे जनता के बीच व उनके पास पहुंचा दिया है. मैंने कभी नहीं सोचा था कि भाजपा की ओर से चुनावी मैदान में आऊंगा. लेकिन जब मुझे इसके लिए चुना गया तो मेरे कदम कभी पीछे नहीं हटे. चुनाव प्रचार के दौरान मेरे ऊपर हमले किये गये. उन्हें जनता के बीच अपनी बातें कहने से रोकने की कोशिश की गयी लेकिन मेरा हौसला कभी नहीं टूटा. चुनाव में जीतने के बाद मुझे आशंका है कि मुझे विकास कार्य करने से रोकने की कोशिश की जायेगी. उन कार्यों में रोड़े लगाये जायेंगे लेकिन कोई जितना भी बाधा देगा मैं उतना ही काम करूंगा.

तृणमूल सरकार की कोई नीति नहीं :

आसनसोल का मौजूदा सांसद हूं मैं लेकिन वहां की स्थिति काफी बुरी है. न ही सड़कों की हालत ठीक है और न ही लोगों की मूलभूत जरूरतों की सुविधाएं हैं. न अस्पताल है और न ही अच्छे शैक्षणिक संस्थान. आसनसोल में आज तक कोई विकासमूलक कार्य हुआ था, यह भी संशय की बात है. केवल आसनसोल ही नहीं मेरा तो मानना है कि पूरे बंगाल में जैसे विकास थम सा गया है. नये उद्योग-धंधे शुरू होने की बात छोड़ दीजिए मौजूदा उद्योग धंधे भी बंद हो रहे हैं. बंगाल की धड़कन माने जाने वाले जूट उद्योगोें की स्थिति भी बदहाल है. राज्य की वर्तमान तृणमूल सरकार की कोई नीति ही नहीं है. जब कोई नीति ही नहीं है तो अच्छे-बुरे की बात तो छोड़ ही दीजिए.

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