"जब-जब UP ने हुंकार भरी, अंग्रेजों की नींव हिली!" काली पलटन से 'शेर-ए-बलिया' तक, जानिए UP के 5 क्रांतिकारी शहरों की कहानी
UP के 5 क्रांतिकारी शहरों की कहानी
UP Freedom Struggle History: 1857 की क्रांति की चिंगारी से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक, उत्तर प्रदेश के कई शहरों ने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान दिया. मेरठ से भड़की क्रांति, कानपुर में बनी क्रांतिकारी सरकार, लखनऊ में बेगम हजरत महल का नेतृत्व, प्रयागराज का राजनीतिक केंद्र बनना और बलिया की समानांतर सरकार की कहानी.
UP Freedom Struggle History: 15 अगस्त आते ही देशभर में स्वतंत्रता संग्राम के वीरों और उनके संघर्ष की कहानियां याद की जाती हैं. उत्तर प्रदेश का इतिहास भी आजादी की लड़ाई के कई ऐसे अध्यायों से जुड़ा है, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी. मेरठ से 1857 की क्रांति की चिंगारी भड़की, कानपुर में क्रांतिकारी सरकार बनी, लखनऊ में बेगम हजरत महल ने मोर्चा संभाला और प्रयागराज स्वतंत्रता आंदोलन की राजनीतिक गतिविधियों का बड़ा केंद्र रहा. वहीं 1942 में बलिया ने कुछ दिनों के लिए अपनी समानांतर सरकार खड़ी कर अंग्रेजी सत्ता को खुली चुनौती दी.
मेरठ से उठी थी 1857 की चिंगारी
1857 की क्रांति की कहानी उत्तर प्रदेश के मेरठ से शुरू होती है. 10 मई 1857 को यहां भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह कर दिया. इससे पहले 85 भारतीय सैनिकों ने एनफील्ड राइफल के कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था. 9 मई को उन्हें सजा देकर जेल भेजा गया. अगले ही दिन सैनिकों ने जेल पर धावा बोलकर अपने साथियों को मुक्त कराया और दिल्ली की ओर कूच कर गए. इसी घटनाक्रम ने 1857 के बड़े विद्रोह को गति दी. मेरठ में काली पलटन यानी औघड़नाथ मंदिर भी इस इतिहास का अहम हिस्सा है. 1857 में यहां सैनिकों की गतिविधियां होती थीं और 9 मई को कारतूस मामले में सजा पाए 85 सैनिकों से जुड़ी घटना भी इसी जगह से जुड़ी है. आज यह स्थान उस दौर के संघर्ष की याद दिलाता है.

कानपुर में बनी थी क्रांतिकारी सरकार
1857 की लड़ाई में कानपुर भी प्रमुख केंद्र बना. यहां नाना साहेब के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह हुआ. 27 जून 1857 को क्रांतिकारी सरकार के गठन के लिए बैठक हुई और नाना साहेब को कानपुर का शासक घोषित किया गया. उनके भाई बाला साहेब को गवर्नर जनरल और ज्वाला प्रसाद को सेनापति बनाया गया. इस तरह कानपुर में अंग्रेजी सत्ता के समानांतर शासन व्यवस्था खड़ी करने की कोशिश हुई. कानपुर की 1857 की कहानी सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं थी. शहर में विद्रोह, प्रशासन पर कब्जे और अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने की कई घटनाएं हुईं. इसी वजह से कानपुर का नाम 1857 के प्रमुख केंद्रों में दर्ज हुआ.

लखनऊ में बेगम हजरत महल ने संभाली कमान
लखनऊ की कहानी में बेगम हजरत महल का नाम सबसे अहम है. 1856 में अंग्रेजों द्वारा अवध के विलय के बाद उन्होंने 1857 के विद्रोह में अंग्रेजी शासन के खिलाफ प्रतिरोध का नेतृत्व किया. अपने बेटे बिरजिस कद्र के साथ उन्होंने अवध में विद्रोही ताकतों को संगठित किया और अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा संभाला. बेगम हजरत महल की भूमिका सिर्फ युद्ध तक सीमित नहीं थी. उन्होंने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी विद्रोह को संभालने की कोशिश की. विद्रोह असफल होने के बाद उन्हें नेपाल में निर्वासन का जीवन बिताना पड़ा, लेकिन उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की प्रमुख महिला योद्धाओं में दर्ज हो गया.

प्रयागराज बना आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र
आज का प्रयागराज, जिसे स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इलाहाबाद कहा जाता था, आजादी की लड़ाई का एक बड़ा राजनीतिक और वैचारिक केंद्र रहा. जिला प्रशासन के इतिहास विवरण के अनुसार, आनंद भवन स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था. इसी शहर में महात्मा गांधी ने देश को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के लिए अहिंसक प्रतिरोध के कार्यक्रम पर जोर दिया था. प्रयागराज में स्थित स्वराज भवन भी स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण गतिविधियों से जुड़ा रहा. मोतीलाल नेहरू ने इसे कांग्रेस को सौंप दिया था और यह स्वराज से जुड़े आंदोलनों के लिए महत्वपूर्ण केंद्र बना.

बलिया ने अंग्रेजों से छीन ली थी सत्ता
अगर स्वतंत्रता आंदोलन के किसी शहर की कहानी सबसे अलग नजर आती है, तो वह बलिया है. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान यहां चित्तू पांडे के नेतृत्व में ऐसी स्थिति बनी कि अंग्रेजी प्रशासन से सत्ता स्थानीय लोगों को सौंप दी गई. 19 अगस्त 1942 को चित्तू पांडे को सरकार का प्रमुख घोषित किया गया और बलिया में कुछ दिनों के लिए समानांतर सरकार चलने लगी. इस दौरान स्थानीय स्तर पर प्रशासन चलाने के लिए पंचायतें बनाई गईं और अलग-अलग इलाकों में व्यवस्था संभालने की कोशिश हुई. हालांकि यह सरकार ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकी. 22-23 अगस्त की रात ब्रिटिश सेना बलिया पहुंची और इस समानांतर सरकार को खत्म कर दिया. इसके बाद गिरफ्तारियां, जुर्माने और सजा का दौर चला. इस घटना के बाद बलिया को ‘क्रांतिकारी बलिया’ और चित्तू पांडे को ‘शेर-ए-बलिया’ के नाम से याद किया गया.

इन शहरों की मिट्टी में आज भी जिंदा है आजादी का इतिहास
उत्तर प्रदेश के इन शहरों की कहानियां बताती हैं कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े नेताओं या कुछ मशहूर घटनाओं तक सीमित नहीं थी. कहीं सैनिकों ने विद्रोह का बिगुल बजाया, कहीं क्रांतिकारियों ने समानांतर सरकार बनाई, तो कहीं महिलाओं ने मोर्चा संभाला और कहीं राजनीतिक आंदोलन को दिशा मिली. 15 अगस्त सिर्फ आजादी का जश्न मनाने का दिन नहीं, बल्कि उन अनगिनत संघर्षों को याद करने का मौका भी है, जिन्होंने भारत को स्वतंत्र बनाने की राह तैयार की.
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लेखक के बारे में
By कोमल अग्रवाल
कोमल अग्रवाल पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और विभिन्न विषयों पर समाचार एवं लेख लिखती हैं. इससे पहले उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में इंटर्नशिप एवं कार्य अनुभव प्राप्त किया है, जहां उन्होंने रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और वीडियो एडिटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज से जनसंचार एवं पत्रकारिता की पढ़ाई की है. कोमल तथ्यपरक, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित पत्रकारिता में विश्वास रखती हैं तथा सरल, सटीक और प्रभावी समाचार लेखन को प्राथमिकता देती हैं.
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