नाम आज़ाद, जीवन आज़ाद और अंत भी आज़ाद, “चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद कहानी"
चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद कहानी
UP Freedom Fighter: चंद्रशेखर आज़ाद, एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी जिन्होंने 'आज़ाद' नाम को चरितार्थ किया. असहयोग आंदोलन से मोहभंग से लेकर क्रांतिकारी गतिविधियों में कूदने तक, उनकी यात्रा प्रेरणादायक है. काकोरी कांड और सॉंडर्स की हत्या में उनकी भूमिका को जानें.
UP Freedom Fighter: चंद्रशेखर आज़ाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्वतंत्रता सेनानी थे. वह शहीद राम प्रसाद बिस्मिल व शहीद भगत सिंह सरीखे क्रान्तिकारियों के अनन्यतम साथियों में से थे. सन् 1922 में गांंधीजी द्वारा असहयोग आन्दोलन को अचानक बन्द कर देने के कारण उनकी विचारधारा में बदलाव आया और वे क्रान्तिकारी गतिविधियों से जुड़ कर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गये. इस संस्था के माध्यम से राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में पहले 9 अगस्त 1925 को काकोरी काण्ड किया और फरार हो गये. 1927 में'बिस्मिल' के साथ 4 प्रमुख साथियों के बलिदान के बाद उन्होंने उत्तर भारत की सभी क्रान्तिकारी पार्टियों को मिलाकर एक करते हुए हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का गठन किया तथा भगत सिंह के साथ लाहौर में लाला लाजपत राय की मौत का बदला सॉण्डर्स की हत्या करके लिया एवं दिल्ली पहुंच कर असेम्बली बम काण्ड को अंजाम दिया.
शुरुवाती जीवन के दिन
चंद्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा,(अब चंद्रशेखर आज़ादनगर)के अलीराजपुर जिला मध्य प्रदेश में 23 जुलाई 1906 को हुआ था. मूल रूप से उनका परिवार उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के बदरका गांव से था, लेकिन पिता सीताराम तिवारी की नौकरी चली जाने के कारण उन्हें अपने पैतृक गांव को छोड़कर मध्यप्रदेश के भाबरा जाना पड़ा था. चंद्रशेखर आजाद का नाम चंद्रशेखर तिवारी था. वह बचपन से ही काफी जिद्दी और विद्रोही स्वभाव के थे. चंद्रशेखर का पूरा बचपन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र झाबरा में ही बीता था. यहां पर उन्होंने बचपन से ही निशानेबाजी और धनुर्विद्या सिखी. लगातार मौका मिलते ही वो इसकी अभ्यास करने लगे, जिसके बाद यह धीरे-धीरे उनका शौक बन गया.
सत्याग्रह से क्रांति की ओर परिवर्तन
वर्ष 1922 में गांधी जी द्वारा असहयोग आंदोलन को वापस ले लिये जाने के बाद वे निराश हुए. चंद्रशेखर आज़ाद ने क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर रुख किया और हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (HRA) से जुड़ गए. वर्ष 1925 में, उन्होंने सशस्त्र संघर्ष के लिये धन जुटाने के लिए काकोरी रेल डकैती में सक्रिय भूमिका निभाई. वर्ष 1928 में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुखदेव, शिव वर्मा और विजय कुमार सिन्हा ने मिलकर HRA का पुनर्गठन किया और समाजवाद को इसके प्रमुख उद्देश्यों में शामिल किया. इसके साथ ही संगठन का नाम बदलकर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रखा गया.
महत्वपूर्ण कार्यवाहिया
HSRA में भगत सिंह इसके राजनीतिक विचारक थे, जबकि चंद्रशेखर आज़ाद ने सैन्य इकाई का नेतृत्व किया. वे योजनाए बनाने, नवयुवकों को प्रशिक्षण देने और हथियारों की व्यवस्था जैसे कार्यों के लिये उत्तरदायी थे. उन्होंने वर्ष 1928 में लाहौर में ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या की योजना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे भगत सिंह और राजगुरु ने अंजाम दिया.

चंद्रशेखर तिवारी को मिला आजाद का नाम
1921 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़ने के बाद उनकी गिरफ्तारी हुई. उस दौरान जब उन्हें जज के सामने पेश किया गया, तो उनके जवाब ने सबके होश उड़ा दिए थे. जब उनसे उनका नाम पूछा गया, तो उन्होंने अपना नाम आजाद और अपने पिता का नाम स्वतंत्रता बताया. इस बात से जज काफी नाराज हो गया और चंद्रशेखर को 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई.

इतिहास के अमर पन्नों में सुनहरे शब्दों में दर्ज है काकोरी कांड
दल ने पूरे देश को अपना उद्देश्य बताने के लिए अपना मशहूर पैम्फलेट 'द रिवोल्यूशनरी' प्रकाशित किया. इसके बाद उस घटना को अंजाम दिया गया, जो भारतीय क्रांति के इतिहास के अमर पन्नों में सुनहरे हर्फों में दर्ज काकोरी कांड है. काकोरी कांड से शायद ही कोई अनजान होगा. दरअसल, इस दौरान दल के दस सदस्यों ने काकोरी ट्रेन लूट को अंजाम दिया था और अंग्रेजों को खुली चुनौती दे दी. इस कांड के लिए देश के महान क्रांतिकारियों रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी.

चौरा-चौरी कांड के बाद कांग्रेस से हुआ मोहभंग
जलियांवाला बाग कांड के बाद चंद्रशेखर को समझ आ चुका था कि अंग्रेजी हुकूमत से आजादी बात से नहीं, बल्कि बंदूक से मिलेगी. शुरुआत में गांधी के अहिंसात्मक गतिविधियों में शामिल हुए, लेकिन चौरा-चौरी कांड के बाद जब आंदोलन वापस ले लिया गया तो, आजाद का कांग्रेस से मोहभंग हो गया और फिर उन्होंने बनारस का रुख किया.
अंतिम संघर्ष (1931)
1929 में केंद्रीय विधानसभा पर हुए बम विस्फोट के बाद गुप्त रूप से कार्य करते हुए, आज़ाद को अंततः 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में एक पुलिस बटालियन ने घेर लिया. उन्होंने अपने साथी सुखदेव राज को सुरक्षित निकलने में सहायता करने के लिए साहसपूर्वक संघर्ष किया और जीवित पकड़े न जाने की प्रतिज्ञा के अनुरूप अंतिम गोली से स्वयं के प्राण की आहुति दी.
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