“बलिया जिला घर बा त कवन बात के डर बा”: जानिए देश से पांच साल पहले आजाद होने वाली उस धरती की कहानी, जहां के लोग कहलाते हैं “बागी”
सांकेतिक तस्वीर
Ballia August Kranti History: 15 अगस्त का इंतजार नहीं, बलिया ने तो 5 साल पहले ही आजादी का बिगुल फूंका था. जानिए चित्तू पांडेय के नेतृत्व में कैसे 'बागी' बलिया ने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी और अपना राज कायम किया.
Ballia August Kranti History: 15 अगस्त आते ही पूरा देश तिरंगे के रंग में रंग जाता है. लाल किले से आजादी का जश्न मनता है, स्कूलों में राष्ट्रगान गूंजता है और शहीदों को नमन किया जाता है. लेकिन पूर्वांचल की धरती पर एक जिला ऐसा भी है, जिसकी मिट्टी आजादी की तारीख से पांच साल पहले ही अंग्रेजी हुकूमत को ललकार चुकी थी. वह जिला है—बलिया. इसीलिए बलिया की धरती का मिजाज शायद इन शब्दों में सबसे ज्यादा उतरता है-
बलिया जिला घर बा त कवन बात के डर बा!
यह सिर्फ एक भोजपुरी जुमला नहीं, बल्कि उस बागी तेवर की पहचान है, जिसने 1942 में अंग्रेजी हुकूमत के सामने ऐसा तूफान खड़ा कर दिया था कि कुछ दिनों के लिए जिले से ब्रिटिश सत्ता का नामोनिशान मिट गया. भारत सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेज भी मानते हैं कि 19 अगस्त 1942 को बलिया में सत्ता स्थानीय लोगों के हाथों में चली गई और चित्तू पांडेय के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार कायम हुई.
9 अगस्त को देश में ‘भारत छोड़ो’ की गूंज, बलिया में बगावत की शुरुआत
8 अगस्त 1942 को बंबई में कांग्रेस ने अंग्रेजों के खिलाफ ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन का बिगुल फूंका. महात्मा गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया. अगले ही दिन देश के बड़े नेताओं को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया.
बलिया में इसका असर बिजली की तरह हुआ.
स्कूल बंद हुए, दुकानें बंद हुईं, छात्र सड़कों पर उतरे और गांव-गांव में अंग्रेजी राज के खिलाफ माहौल बनने लगा. सरकारी प्रतिष्ठान, रेलवे स्टेशन, डाकघर, पुलिस थाने और अंग्रेजी शासन के प्रतीक आंदोलनकारियों के निशाने पर आने लगे. भारत सरकार के दस्तावेजों में बिल्थरारोड रेलवे स्टेशन, रसड़ा तहसील, पानी की टंकी, थानों, डाकघरों और संचार व्यवस्था पर हुए हमलों का उल्लेख मिलता है.
लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी.
बैरिया ने दी क्रांति को खून की कीमत
अंग्रेजी सत्ता को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब आंदोलनकारियों और पुलिस के बीच टकराव बढ़ा. बैरिया थाना बलिया की क्रांति का सबसे दर्दनाक अध्याय बन गया. तिरंगा फहराने निकले आंदोलनकारियों पर गोली चली. कई लोगों ने अपनी जान गंवाई. 18 अगस्त को बैरिया में तिरंगा फहराने के प्रयास में 17 क्रांतिकारियों की शहादत का उल्लेख स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में मिलता है.
गोली चली तो बलिया और भड़क उठा.
अब यह आंदोलन केवल अंग्रेजों के खिलाफ नारे लगाने तक सीमित नहीं था. लोगों ने तय कर लिया था कि अंग्रेजी हुकूमत को उसके ही प्रशासनिक ढांचे से बेदखल करना है.
17-18 अगस्त: गांवों से उठी बगावत, थाने और रेलवे स्टेशन बने निशाना
रसड़ा, बैरिया, गड़वार, सिकंदरपुर, हलधरपुर, नगरा, उभांव समेत कई इलाकों में जनता सड़कों पर उतर आई. कई सरकारी प्रतिष्ठानों पर कब्जा किया गया. रेल की पटरियां उखाड़ी गईं. रेलवे स्टेशनों पर हमला हुआ. थानों में रखे हथियार आंदोलनकारियों के हाथ लगे. अंग्रेजी प्रशासन का स्थानीय ढांचा जगह-जगह चरमराने लगा. जिलाधिकारी जगदीश्वर निगम को धीरे-धीरे एहसास हो गया था कि हालात सामान्य प्रशासन के हाथ से निकल चुके हैं. और फिर आया वह दिन, जिसने बलिया को इतिहास में अमर कर दिया.
19 अगस्त 1942: जब बलिया ने कहा—अब अंग्रेजी राज नहीं चलेगा
सुबह से ही बलिया शहर की ओर लोगों का सैलाब उमड़ने लगा. किसी के हाथ में लाठी थी, किसी के हाथ में फावड़ा, किसी के हाथ में कुदाल तो कोई खाली हाथ ही आजादी की लड़ाई में शामिल था. हजारों लोग जिला जेल की ओर बढ़ रहे थे. उनकी एक ही मांग थी, जेल में बंद चित्तू पांडेय और दूसरे आंदोलनकारियों को रिहा करो. जिला प्रशासन के सामने अब दो रास्ते थे. जनता पर गोली चलाना या फिर रास्ता छोड़ देना. आखिरकार अंग्रेजी प्रशासन को पीछे हटना पड़ा. चित्तू पांडेय समेत कई आंदोलनकारी जेल से बाहर आए. भारत सरकार के ऐतिहासिक दस्तावेज के अनुसार इस घटनाक्रम के दौरान करीब 40 हजार लोग बलिया में जुटे थे.
चित्तू पांडेय बने ‘शेर-ए-बलिया’, अंग्रेजी सत्ता को दे दिया जवाब
चित्तू पांडेय बाहर आए तो बलिया की जनता ने उन्हें अपना नेता मान लिया. यहीं से शुरू हुई आजाद बलिया की कहानी. कलेक्ट्रेट पर अंग्रेजी सत्ता का प्रतीक झंडा उतरा और राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. प्रशासन की कमान स्थानीय नेतृत्व के हाथों में आई. चित्तू पांडेय के नेतृत्व में राष्ट्रीय सरकार बनी और अलग-अलग इलाकों में पंचायतों के माध्यम से प्रशासन चलाने की व्यवस्था की गई. इतिहास में चित्तू पांडेय को इसी वजह से ‘शेर-ए-बलिया’ कहा गया. बलिया अब केवल आंदोलन नहीं कर रहा था. बलिया ने अपना राज कायम कर दिया था.
अंग्रेजों ने तार भेजा—‘Ballia Reconquered’
बलिया की बगावत का असर इतना गहरा था कि अंग्रेजी शासन को सैन्य बल के जरिए दोबारा नियंत्रण हासिल करना पड़ा. 22-23 अगस्त की रात ब्रिटिश सेना बलिया में दाखिल हुई और राष्ट्रीय सरकार को खत्म कर दिया गया. इसके बाद गिरफ्तारियों, जुर्माने और दमन का दौर शुरू हुआ. भारत सरकार के दस्तावेज में ब्रिटिश अधिकारी द्वारा गवर्नर को भेजे गए संदेश ‘Ballia Reconquered’ का उल्लेख है.
सोचिए...
अंग्रेजों के लिए बलिया पर दोबारा कब्जा करना इतना बड़ा घटनाक्रम था कि उसे तार से बताना पड़ा “Ballia Reconquered” बलिया को फिर से जीत लिया गया. यानी अंग्रेज खुद स्वीकार कर रहे थे कि बलिया उनके कब्जे से निकल चुका था.
आजादी कुछ दिनों की थी, लेकिन संदेश सदियों का
इतिहास में यह सवाल कभी-कभी उठता है कि बलिया की आजादी कितने दिन रही. किसी विवरण में इसे 24 घंटे कहा गया, कहीं कुछ दिन और कहीं राष्ट्रीय सरकार के सीमित अवधि तक चलने का उल्लेख मिलता है. लेकिन असली सवाल अवधि का नहीं है.
असली सवाल यह है कि—
1942 में अंग्रेजों की सत्ता को चुनौती देकर बलिया ने यह साबित कर दिया था कि जनता चाहे तो साम्राज्य की नींव हिला सकती है. ब्रिटिश सेना ने बलिया पर दोबारा कब्जा जरूर कर लिया, लेकिन बलिया की बगावत को खत्म नहीं कर सकी. उसने एक ऐसा इतिहास लिख दिया, जिसे 15 अगस्त 1947 की आजादी ने भी मिटाया नहीं, बल्कि और गौरव दे दिया.
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन बलिया के पास पहले से थी अपनी कहानी
देश को 15 अगस्त 1947 को आजादी मिली. बलिया ने इससे ठीक पांच साल पहले, 19 अगस्त 1942 को अंग्रेजी शासन से अपनी आजादी का ऐलान कर दिया था. इसीलिए बलिया में 19 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की तारीख नहीं है. यह उस जनता की याद है जिसने अंग्रेजों से कहा था—
अब बहुत हो चुका.
यह चित्तू पांडेय की याद है. यह बैरिया के शहीदों की याद है. यह उन किसानों और युवाओं की याद है जो बिना किसी बड़े हथियार के अंग्रेजी साम्राज्य के सामने खड़े हो गए थे. यह उन अनगिनत चेहरों की याद है जिनके नाम इतिहास की किताबों में भले न लिखे गए हों, लेकिन जिनके साहस ने आजादी की इबारत लिखी.
आज 15 अगस्त पर बलिया क्यों सबसे अलग दिखता है?
क्योंकि बाकी देश 15 अगस्त को आजादी का जश्न मनाता है, लेकिन बलिया के पास आजादी की अपनी एक अतिरिक्त तारीख भी है.
19 अगस्त 1942.
उस दिन बलिया ने अंग्रेजों को यह बता दिया था कि सत्ता बंदूकों से कब्जाई जा सकती है, लेकिन जनता के भीतर पैदा हो चुकी आजादी की आग को बंदूकें हमेशा के लिए नहीं बुझा सकतीं. इसलिए जब 15 अगस्त को तिरंगा आसमान में लहराता है तो बलिया की मिट्टी शायद बाकी देश से थोड़ा अलग अंदाज में कहती है—
“बलिया जिला घर बा त कवन बात के डर बा!”
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लेखक के बारे में
By तिलक कुमार
तिलक कुमार पिछले 14 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. उन्हें प्रिंट और डिजिटल मीडिया में रिपोर्टिंग का व्यापक अनुभव है. अमर उजाला, प्रभात खबर, जनसंदेश टाइम्स और राष्ट्रीय सहारा जैसे प्रतिष्ठित समाचार संस्थानों में क्राइम रिपोर्टर के रूप में कार्य कर चुके हैं. अपराध, राजनीति और हाइपरलोकल पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि और विशेषज्ञता के क्षेत्र हैं. मैदानी रिपोर्टिंग के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण और प्रभावशाली खबरों को पाठकों तक पहुंचाया है. जमीनी मुद्दों की गहरी समझ और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग उनकी पहचान रही है. वर्तमान में वह प्रभात खबर की डिजिटल टीम के साथ जुड़े हुए हैं और उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध तथा जनसरोकारों से जुड़े मुद्दों पर लगातार लेखन और रिपोर्टिंग कर रहे हैं.
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