विरासत में जायदाद नहीं, आज़ादी का जुनून मिला! एक भाई जेल गया तो दूसरे ने संभाली कमान, UP के 5 परिवारों की 'अनटोल्ड' स्टोरी

आजादी में UP के परिवारों का बड़ा योगदान (AI सांकेतिक तस्वीर)

UP के वीर परिवारों ने मिलकर लिखी आजादी की अनकही कहानी
आजादी की लड़ाई में परिवार भी बने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चे की ताकत
आजादी की लड़ाई सिर्फ कुछ बड़े नेताओं की कहानी नहीं थी. उत्तर प्रदेश में ऐसे कई परिवार रहे, जिनके एक से ज्यादा सदस्यों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मोर्चा संभाला. किसी परिवार ने 1857 के विद्रोह में हथियार उठाए, तो किसी ने असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन में जेल की सजा झेली. कई बार एक सदस्य के जेल जाने के बाद परिवार का दूसरा सदस्य आंदोलन की कमान संभालता रहा. स्वतंत्रता दिवस के मौके पर जानिए UP के ऐसे ही पांच परिवारों की कहानी, जिनकी पीढ़ियों ने आजादी की लड़ाई में अपना योगदान दिया.

आनंद भवन बना आजादी की लड़ाई का अहम केंद्र (AI सांकेतिक तस्वीर)
1. नेहरू परिवार: आनंद भवन बना आजादी की रणनीतियों और आंदोलनों का गवाह
प्रयागराज का आनंद भवन सिर्फ एक आलीशान घर नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन की कई महत्वपूर्ण गतिविधियों का केंद्र रहा. मोतीलाल नेहरू ने अपनी संपत्ति और सार्वजनिक जीवन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा, जबकि उनके बेटे जवाहरलाल नेहरू आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए. परिवार की महिलाएं भी इससे अलग नहीं रहीं. कमला नेहरू ने आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की. आनंद भवन में राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े नेताओं की आवाजाही होती थी और यहां लिए गए फैसलों का असर देश की राजनीति पर पड़ता था. यही वजह है कि आज भी आनंद भवन को नेहरू परिवार और स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़कर देखा जाता है.

पिता-पुत्र ने 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ संभाला मोर्चा (AI सांकेतिक तस्वीर)
2. कलाकांकर का सिंह परिवार: पिता ने बेटे को सौंपी कमान, अंग्रेजों के खिलाफ उतरा पूरा परिवार
प्रतापगढ़ के कलाकांकर का सिंह परिवार 1857 के विद्रोह में अंग्रेजों के खिलाफ खड़ा हुआ. राजा हनुमंत सिंह ने बेगम हजरत महल के समर्थन में सैनिकों की एक टुकड़ी तैयार की और इसकी कमान अपने बड़े बेटे लाल प्रताप सिंह को सौंपी. लाल प्रताप सिंह ने 1857-58 के संघर्ष में सक्रिय भूमिका निभाई और 1858 में चंदा की लड़ाई में मारे गए. यानी यहां आजादी की लड़ाई सिर्फ व्यक्तिगत विरोध नहीं रही, बल्कि पिता और पुत्र दोनों ने मिलकर अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा संभाला. लाल प्रताप सिंह की भूमिका को याद करते हुए भारत सरकार ने उनके नाम पर डाक टिकट भी जारी किया था.

एक भाई की गिरफ्तारी के बाद दूसरे ने संभाला आंदोलन (AI सांकेतिक तस्वीर)
3. संतकबीरनगर के मिश्र बंधु: एक भाई जेल गया तो दूसरे ने थामा आंदोलन का मोर्चा
संतकबीरनगर के रक्सा गांव के मिश्र बंधुओं की कहानी बताती है कि आंदोलन में परिवार किस तरह लगातार सक्रिय रह सकता है. लालसा प्रसाद मिश्र, श्यामलाल मिश्र, वंशराज मिश्र और द्विजेंद्र मिश्र ने अलग-अलग समय पर स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया. लालसा प्रसाद को जेल भेजे जाने के बाद उनके भाई श्यामलाल ने आंदोलन की कमान संभाली और सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल हुए. 1942 में लालसा प्रसाद की गिरफ्तारी के दौरान वंशराज ने क्षेत्र में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया और जेल गए. इसके बाद चौथे भाई द्विजेंद्र ने व्यक्तिगत सत्याग्रह किया और उन्हें भी जेल की सजा मिली. बार-बार गिरफ्तारी और जुर्माने के बावजूद परिवार का आंदोलन से जुड़ाव बना रहा.

पीढ़ियों तक जारी रही अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की विरासत (AI सांकेतिक तस्वीर)
4. बरेली का शास्त्री परिवार: तीन पीढ़ियों ने झेली जेल की सजा
बरेली के बृजमोहन लाल शास्त्री का परिवार भी स्वतंत्रता आंदोलन में कई पीढ़ियों की भागीदारी का उदाहरण है. परिवार के अनुसार, बृजमोहन लाल से पहले उनके पिता रामभजन लाल भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े थे. इसके बाद बृजमोहन लाल और उनके बेटे ओंकारनाथ शास्त्री ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष किया. परिवार के सदस्यों ने कई बार जेल की सजा झेली. बृजमोहन लाल भारत छोड़ो आंदोलन समेत राष्ट्रीय आंदोलन की विभिन्न गतिविधियों में शामिल रहे. इस तरह इस परिवार में स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही. आज बरेली में बृजमोहन लाल शास्त्री की प्रतिमा भी उनकी भूमिका की याद दिलाती है.

1857 से आजाद हिंद फौज तक जारी रहा संघर्ष (AI सांकेतिक तस्वीर)
5. बुलंदशहर का परिवार: 1857 की फांसी से आजाद हिंद फौज तक
बुलंदशहर के रुस्तम अली खान और उनके पोते कैप्टन अब्बास अली की कहानी दो अलग दौर के संघर्ष को जोड़ती है. 1857 के विद्रोह के बाद रुस्तम अली खान को अंग्रेजों ने बुलंदशहर के काला आम में फांसी दी थी. कई दशक बाद इसी परिवार की अगली पीढ़ी में कैप्टन अब्बास अली स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. वे सुभाष चंद्र बोस के संपर्क में आए और आजाद हिंद फौज में भी शामिल हुए. इस तरह एक ही परिवार की दो पीढ़ियों ने अलग-अलग दौर में ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया. एक ने 1857 में विद्रोह का रास्ता चुना तो दूसरी ने आजाद हिंद फौज के साथ आजादी की लड़ाई आगे बढ़ाई.

संघर्ष की यही विरासत बनी आजादी की राह (AI सांकेतिक तस्वीर)
नाम बदले, दौर बदला, लेकिन परिवारों का संघर्ष नहीं रुका
इन परिवारों की कहानियां बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन किसी एक शहर, संगठन या पीढ़ी तक सीमित नहीं था. उत्तर प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में परिवारों ने अपने स्तर पर आंदोलन को आगे बढ़ाया. कहीं पिता ने बेटे को संघर्ष की कमान सौंपी, कहीं भाइयों ने एक-दूसरे के जेल जाने के बाद आंदोलन संभाला और कहीं 1857 की लड़ाई की विरासत अगली पीढ़ी तक पहुंची. यही छोटी-बड़ी कहानियां मिलकर उस लंबे संघर्ष की तस्वीर बनाती हैं, जिसके बाद देश ने 15 अगस्त 1947 को आजादी का सूरज देखा.
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लेखक के बारे में
By कोमल अग्रवाल
कोमल अग्रवाल पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और विभिन्न विषयों पर समाचार एवं लेख लिखती हैं. इससे पहले उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में इंटर्नशिप एवं कार्य अनुभव प्राप्त किया है, जहां उन्होंने रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और वीडियो एडिटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज से जनसंचार एवं पत्रकारिता की पढ़ाई की है. कोमल तथ्यपरक, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित पत्रकारिता में विश्वास रखती हैं तथा सरल, सटीक और प्रभावी समाचार लेखन को प्राथमिकता देती हैं.
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