गुमनाम नहीं होगी शहीदों की कुर्बानी, 90 साल से लखनऊ का खत्री परिवार, जो तीन पीढ़ियों से संभाल रहा है शहीदों की विरासत
90 साल से लखनऊ का खत्री परिवार,संभाल रहा है शहीदों की विरासत
UP News: लखनऊ के कैसरबाग में एक ऐसा अनोखा स्थान है जहाँ भारतीय स्वाधीनता संग्राम की ऐतिहासिक गाथा जीवंत है. रामकृष्ण खत्री के परिवार की तीन पीढ़ियाँ पिछले 90 सालों से शहीदों की स्मृतियों को संजोए हुए हैं, निस्वार्थ सेवा और समर्पण की एक अनूठी मिसाल पेश करते हुए.
Up News: उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के कैसरबाग क्षेत्र में लाटूश रोड की तरफ एक अत्यंत पतली गली स्थित है. इस तंग मार्ग में प्रवेश करते ही एक संकरा जीना दिखाई देता है. इस सीढ़ी से ऊपर जाने पर पहली मंजिल पर एक साधारण सा आवास है. यहाँ दस बाई दस आकार का एक छोटा सा कमरा मौजूद है, जिसकी चारों दीवारों पर अमर सेनानियों के अनेक चित्र टंगे हुए हैं. ये सभी दुर्लभ तस्वीरें चीख-चीखकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम की ऐतिहासिक गाथा बयाँ करती हैं.
क्रांतिवीर रामकृष्ण खत्री का अविस्मरणीय योगदान
यह ऐतिहासिक कक्ष वास्तव में महान क्रांतिकारी रामकृष्ण खत्री का रहा है. उन्होंने प्रसिद्ध काकोरी घटना के कारण पूरे एक दशक तक कठोर कारावास की पीड़ा सही थी. वर्ष 1937 से 1996 तक रामकृष्ण जी ने सेनानियों की स्मृतियाँ संजोने का पावन कार्य किया. उनके उपरांत उनके पुत्र दिवंगत उदय खत्री ने 1996 से 2023 तक इस जिम्मेदारी को निष्ठापूर्वक संभाला. वर्तमान में वर्ष 2023 के बाद से उनके पौत्र रोहित खत्री निरंतर इस पावन विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं.
निस्वार्थ सेवा और शहीदों के प्रति समर्पण
यह समर्पित परिवार प्रतिवर्ष लगभग तीस राष्ट्रभक्ति पूर्ण कार्यक्रमों का भव्य आयोजन आयोजित करता है. इसके अतिरिक्त, क्रांतिकारियों तथा उनके परिजनों के रहने हेतु बनाया गया सेवा सदन परिसर भी इसी परिवार का महत्वपूर्ण योगदान है. इन्होंने काकोरी शहीद स्मारक एवं संग्रहालय के निर्माण में अपनी अहम भूमिका निभाई. इन महान कार्यों के बावजूद, इस निष्ठावान परिवार ने अपने व्यक्तिगत लाभ हेतु कभी किसी भी सरकार से कोई मांग या अपेक्षा नहीं रखी. वे सदैव केवल देशभक्ति की भावना से कार्य करते रहे.
काकोरी एक्शन और स्वाधीनता संग्राम की गाथा
नौ अगस्त 1925 को लखनऊ के निकट काकोरी स्टेशन के पास घटित घटना को काकोरी एक्शन कहा जाता है. उस दौर में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) को सैन्य क्रांति हेतु धन की नितांत आवश्यकता थी. पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में जांबाज युवाओं ने सहारनपुर से लखनऊ आ रही ट्रेन को रोककर सरकारी खजाना अपने कब्जे में ले लिया था. इस साहसिक योजना की रेकी करने में रामकृष्ण खत्री जी की सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.
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