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मुगल साम्राज्य, ब्रितानी हुकूमत और आजादी के बाद भी अनसुलझा रहा था अयोध्या मसला

Updated at : 10 Nov 2019 1:05 PM (IST)
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मुगल साम्राज्य, ब्रितानी हुकूमत और आजादी के बाद भी अनसुलझा रहा था अयोध्या मसला

नयी दिल्ली : मुगल साम्राज्य, औपनिवेशिक शासन… और फिर स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक अनसुलझा रहा अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद आखिरिकार नौ नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीराम लला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त […]

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नयी दिल्ली : मुगल साम्राज्य, औपनिवेशिक शासन… और फिर स्वतंत्रता के बाद भी दशकों तक अनसुलझा रहा अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद आखिरिकार नौ नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद समाप्त हो गया. सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को कहा कि 1989 में ‘भगवान श्रीराम लला विराजमान’ की ओर से दायर याचिका बेवक्त नहीं थी, क्योंकि अयोध्या में विवादित मस्जिद की मौजूदगी के बावजूद उनकी ‘पूजा-सेवा’ जारी रही.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने मुसलमान पक्ष की इस दलील को खारिज कर दिया कि रामलला विराजमान की ओर से दायर याचिका बेवक्त है, क्योंकि घटना 1949 की है और याचिका 1989 में दायर की गयी है.

अयोध्या में विवादित स्थल राम जन्मभूमि पर मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त करते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि ‘सुन्नी वक्फ बोर्ड’ को मस्जिद के निर्माण के लिए पांच एकड़ भूमि आवंटित की जाये. भारतीय इतिहास की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण इस व्यवस्था के साथ ही करीब 135 साल से चले आ रहे इस संवेदनशील विवाद पर पर्दा गिर गया. देश का सामाजिक ताना बाना इस विवाद के चलते बिखरा हुआ था.

मुगल बादशाह बाबर के कमांडर मीर बाकी ने बाबरी मस्जिद का निर्माण 1528 में कराया था. यह पाया गया कि यह स्थल दशकों से ‘निरंतर संघर्ष’ का एक केंद्र रहा और 1856-57 में, मस्जिद के आसपास के इलाकों में हिंदू और मुसलमानों के बीच कई बार दंगे भड़क उठे.

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दो धार्मिक समुदायों के बीच कानून-व्यवस्था और शांति बनाये रखने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने परिसर को भीतरी और बाहरी बरामदे में विभाजित करते हुए छह से सात फुट ऊंची ग्रिल-ईंट की दीवार खड़ी की. भीतरी बरामदे का इस्तेमाल मुसलमान नमाज पढ़ने के लिए और बाहरी बरामदे का इस्तेमाल हिंदू पूजा के लिए करने लगे.

इस विवाद में पहला मुकदमा ‘राम लला’ के भक्त गोपाल सिंह विशारद ने 16 जनवरी, 1950 को दायर किया था. इसमें उन्होंने विवादित स्थल पर हिंदुओं की पूजा-अर्चना का अधिकार लागू करने का अनुरोध किया था. उसी साल, पांच दिसंबर, 1950 को परमहंस रामचंद्र दास ने भी पूजा-अर्चना जारी रखने और विवादित ढांचे के मध्य गुंबद के नीचे ही मूर्तियां रखी रहने के लिए मुकदमा दायर किया था.

रामचंद्र दास ने 18 सितंबर, 1990 को यह मुकदमा वापस ले लिया. बाद में, निर्मोही अखाड़ा ने 1959 में 2.77 एकड़ विवादित स्थल के प्रबंधन और शेबैती अधिकार के लिए निचली अदालत में वाद दायर किया. इसके दो साल बाद 18 दिसंबर, 1961 को उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड भी अदालत में पहुंचा गया और उसने बाबरी मस्जिद की विवादित संपत्ति पर अपना मालिकाना हक होने का दावा करते हुए इसे बोर्ड को सौंपने और वहां रखी मूर्तियां हटाने का अनुरोध किया.

अयोध्या में छह दिसंबर, 1992 को विवादित ढांचा गिराये जाने की घटना और इसे लेकर देश में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद सारे मुकदमे इलाहाबाद हाइकोर्ट को निर्णय के लिए सौंप दिये गये. इलाहाबाद हाइकोर्ट के 30 सितंबर, 2010 के फैसले में 2.77 एकड़ विवादित भूमि तीन पक्षकारों (सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला) के बीच बांटने के आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी थी.

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