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उत्तरप्रदेश : राज बब्बर के जाने से कांग्रेस निखर जाएगी या बिखर जाएगी?

Updated at : 21 Mar 2018 6:20 PM (IST)
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उत्तरप्रदेश : राज बब्बर के जाने से कांग्रेस निखर जाएगी या बिखर जाएगी?

लखनऊ : उत्तरप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद फिल्मों से राजनीति में आये राज बब्बर ने छोड़ने का संकेत दिया है. हालांकि यूपी कांग्रेस के बड़े नेता प्रमोद तिवारी ने कहा है कि राज बब्बर ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया हैऔर इस पर अभी सस्पेंस कायम है. बहरहाल, उनका पद छोड़नेका संकेत देना कांग्रेस […]

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लखनऊ : उत्तरप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का पद फिल्मों से राजनीति में आये राज बब्बर ने छोड़ने का संकेत दिया है. हालांकि यूपी कांग्रेस के बड़े नेता प्रमोद तिवारी ने कहा है कि राज बब्बर ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया हैऔर इस पर अभी सस्पेंस कायम है. बहरहाल, उनका पद छोड़नेका संकेत देना कांग्रेस महाधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के इशारों का परिणाम माना जा रहा है. राहुल गांधी ने कहा था कि पार्टी को चुनाव के लिए तैयार करेंगे और सात-आठ महीने में बड़े झटके लगेंगे, नयी प्रतिभाओं, युवाओं को आगे करेंगे. राहुल गांधी का यह संकेत पार्टी के पुराने नेताओं के लिए है कि अब आप पार्टी का पद युवाओं के लिए छोड़ दीजिए. अबतक राज बब्बर के अलावा गोवा कांग्रेस अध्यक्ष व गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष ने भी पद छोड़ने का संकेत दिया है. कहा जा रहा है कि एक दर्जन प्रदेश अध्यक्ष पद छोड़ सकते हैं.

राज बब्बर का पद छोड़ना इस मायने में खास है कि उत्तरप्रदेश देश का सबसे बड़ा सूबा है, जहां लोकसभा की 80 सीटें हैं. कांग्रेस को सत्ता में आने के लिए या फिर भाजपा की वापसी रोकने के लिए वहां खुद को मजबूत करना होगा या फिर भाजपा विरोधी गठजोड़ को मजबूत करना होगा. उत्तरप्रदेश में सपा-बसपा गठजोड़ के पक्ष में हर दिन पॉजिटिव बातें आती हैं, लेकिन इसमें कांग्रेस का क्या रोल होगा इस पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने सुखद संकेत नहीं दिया है, उल्टे वे पंजाब दौरे पर कांशीराम जयंती समारोह के दौरान कांग्रेस पर जमकर बरसीं. हां, अखिलेश यादव जरूर कांग्रेस व राहुल गांधी के सद्भावना दिखाते रहते हैं.

राहुल गांधी ने राजस्थान में सचिन पायलट व मध्यप्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे कर कुछ अच्छी पहल की है, जिसके नतीजे भी पॉजिटिव हैं. ऐसे में यह संभव है कि वे यूपी में भी ऐसा कर सकते हैं और इस क्रम में कोई ब्राह्मण चेहरा लाया जा सकता है. शायदों ब्राह्मणों के प्रति कांग्रेस का यह नरम रुख ही मायावती को बेचैन करता है, क्योंकि कांग्रेस के कमजोर होने से ब्राह्मणों का रुझान बसपा की ओर हुआ था और फिर उनका भाजपा की ओर झुकाव देखने को मिला था.

गोरखपुर उपचुनाव में ब्राह्मण उम्मीदवार के हारने व विपक्ष के उम्मीदवार के जीतने से कांग्रेस इस समुदाय के प्रति सहानुभूति दिखाना चाहती है, ताकि उनका रुख कांग्रेस की ओर हो. 2009 के लोकसभा चुनाव में जब यूपी के मामलों को राहुल गांधी देखते थे तब कांग्रेस ने वहां 21 लोकसभा सीटें जीती थी. ऐसे में यह भी संभव है कि वे वहां ब्राह्मण प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त कर सीधे यूपी के मामलों पर नजर रखें. यूं भी राज बब्बर के नेतृत्व में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस कोई कमाल नहीं कर सकी थी और उसकी सीटें 29 से घटकर सात हो गयी थीं, जबकि उसका सपा जैसी मजबूत पार्टी से गठजोड़ था.

कांग्रेस के पास राज्य में लोकसभा की दो सीटें ही हैं राहुल गांधी की सीट अमेठी व सोनिया गांधी की सीट रायबरेली. ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में की गयी कोई पहल, युवाओं को कमान सौंपने से पार्टी अब ऊपर ही जाएगी.


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