7 बार केदारनाथ का पुण्य, कबीर का ज्ञान और जलती चिताएं...बनारस के इन 5 घाटों की कहानियां आपको हैरान कर देंगी

काशी के 5 घाट, 5 अनोखी कहानियां

काशी के घाटों में बसती है बनारस की आत्मा
काशी के घाटों में बसी हैं अनोखी मान्यताएं और सदियों पुरानी कहानियां
वाराणसी यानी काशी को सिर्फ मंदिरों और संकरी गलियों का शहर कहना अधूरा होगा. गंगा किनारे बने घाट इस शहर की आत्मा माने जाते हैं. यहां हर घाट का अपना अलग रंग, इतिहास, धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी मान्यताएं हैं. कहीं सुबह की पहली किरण के साथ मंत्र गूंजते हैं, तो कहीं शाम को गंगा आरती का अद्भुत नजारा दिखाई देता है. आइए जानते हैं काशी के पांच ऐसे प्रसिद्ध घाटों के बारे में, जिनकी पहचान देश-दुनिया में अलग है.

दीयों की रोशनी में जगमगाता दशाश्वमेध घाट
1. दशाश्वमेध घाट: जहां हर शाम गंगा आरती बनती है खास
काशी के सबसे प्रसिद्ध घाटों में दशाश्वमेध घाट का नाम सबसे पहले लिया जाता है. शाम होते ही यहां होने वाली गंगा आरती देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. घंटियों, शंख, मंत्रोच्चार और दीपों से सजा घाट गंगा किनारे का बेहद खास दृश्य प्रस्तुत करता है. आधिकारिक पर्यटन जानकारी के अनुसार, यहां होने वाली आरती करीब 45 मिनट चलती है. इस घाट की कहानी क्या है? दशाश्वमेध घाट के नाम और उत्पत्ति को लेकर धार्मिक मान्यता जुड़ी है. मान्यता के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव के कहने पर यहां दस अश्वमेध यज्ञ किए थे. इसी वजह से इसे दशाश्वमेध नाम मिला. हालांकि यह धार्मिक मान्यता है, ऐतिहासिक तथ्य के रूप में नहीं.

जहां जीवन और मृत्यु साथ दिखाई देते हैं
2. मणिकर्णिका घाट: काशी का वो घाट जहां जीवन और मृत्यु साथ दिखते हैं
मणिकर्णिका घाट काशी के सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र घाटों में शामिल है. यह मुख्य रूप से अंतिम संस्कार के लिए जाना जाता है और हिंदू धार्मिक परंपरा में इसका विशेष महत्व है. यहां जीवन और मृत्यु को लेकर काशी की गहरी आध्यात्मिक अवधारणा दिखाई देती है. मणिकर्णिका नाम कैसे पड़ा? इस घाट से जुड़ी एक प्रसिद्ध धार्मिक कथा के अनुसार, देवी पार्वती का एक मणि-जड़ित कुंडल यहां गिर गया था. भगवान शिव ने उसे खोजने के लिए यहां एक कुंड खोदा. इसी कथा से मणिकर्णिका नाम जुड़ा माना जाता है. यहां मणिकर्णिका कुंड भी स्थित है. यह भी धार्मिक मान्यता है.

सूर्योदय के साथ शुरू होती काशी की सुबह
3. अस्सी घाट: जहां बनारस की सुबह सबसे खूबसूरत लगती है
अगर दशाश्वमेध घाट काशी की शाम के लिए मशहूर है, तो अस्सी घाट की पहचान उसकी सुबह से है. सूर्योदय के समय यहां होने वाला ‘सुबह-ए-बनारस’ कार्यक्रम लोगों को खास आकर्षित करता है. वैदिक मंत्रोच्चार, प्रार्थना, योग और ध्यान के बीच गंगा किनारे उगता सूरज इस घाट को अलग माहौल देता है. अस्सी नाम की कहानी क्या है? अस्सी घाट का नाम अस्सी नदी से जुड़ा है. मान्यता है कि इसी स्थान पर अस्सी नदी गंगा में मिलती है. एक अन्य धार्मिक कथा में देवी दुर्गा और असुरों के वध के बाद उनके शस्त्र से निकली धारा का संबंध अस्सी नदी से बताया जाता है.

कबीर और संत परंपरा से जुड़ा पंचगंगा घाट
4. पंचगंगा घाट: संत कबीर और गुरु रामानंद से जुड़ी कहानी
पंचगंगा घाट काशी के प्रमुख धार्मिक घाटों में गिना जाता है. इसका नाम धार्मिक मान्यता में पांच नदियों के संगम से जुड़ा हुआ है. यह घाट केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि संत परंपरा से जुड़े प्रसंगों के कारण भी खास माना जाता है. संत कबीर से क्या है संबंध? काशी के घाटों से जुड़ी आधिकारिक पर्यटन सामग्री में पंचगंगा घाट के बारे में बताया गया है कि संत कबीर ने यहीं अपने गुरु स्वामी रामानंद को पाया था. यही वजह है कि यह घाट काशी की संत परंपरा और आध्यात्मिक इतिहास में भी खास स्थान रखता है.

काशी में दिखता है दक्षिण भारत का रंग
5. केदार घाट: काशी में दिखता है दक्षिण भारत का रंग
केदार घाट वाराणसी के प्रमुख घाटों में शामिल है. यहां स्थित केदारेश्वर मंदिर इसकी सबसे बड़ी पहचान है. घाट का धार्मिक माहौल और दक्षिण भारतीय शैली की झलक इसे काशी के दूसरे घाटों से अलग बनाती है. यहां गंगा स्नान के साथ भगवान शिव के दर्शन के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. केदार घाट की खास मान्यता क्या है? धार्मिक मान्यता के अनुसार, काशी के केदारेश्वर मंदिर में पूजा करने से केदारनाथ की पूजा के मुकाबले सात गुना पुण्य मिलता है. इसी वजह से यहां दर्शन के लिए श्रद्धालुओं की खास आस्था है. मंदिर, घाट की सीढ़ियों और गंगा का खूबसूरत दृश्य इसे काशी की खास जगहों में शामिल करता है.

घाटों में समाई है काशी की पूरी कहानी
अंत में... काशी को समझना है तो घाटों को समझिए
वाराणसी के घाट सिर्फ गंगा किनारे बनी सीढ़ियां नहीं हैं. ये शहर की आस्था, परंपरा, संगीत, साधना, जीवन और मृत्यु सबको एक साथ समेटे हुए हैं. सुबह अस्सी घाट से शुरू होने वाली काशी की यात्रा शाम को दशाश्वमेध की गंगा आरती तक पहुंचती है, जबकि रास्ते में मणिकर्णिका, पंचगंगा और केदार जैसे घाट अपनी अलग कहानियां सुनाते हैं. शायद यही वजह है कि काशी को समझने के लिए उसके घाटों को देखना और उनकी कहानियों को जानना जरूरी है.
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लेखक के बारे में
By कोमल अग्रवाल
कोमल अग्रवाल पिछले तीन वर्षों से पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. वे डिजिटल मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय हैं और विभिन्न विषयों पर समाचार एवं लेख लिखती हैं. इससे पहले उन्होंने प्रिंट और डिजिटल मीडिया में इंटर्नशिप एवं कार्य अनुभव प्राप्त किया है, जहां उन्होंने रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग, सोशल मीडिया मैनेजमेंट और वीडियो एडिटिंग जैसे क्षेत्रों में काम किया. उन्होंने पटना विमेंस कॉलेज से जनसंचार एवं पत्रकारिता की पढ़ाई की है. कोमल तथ्यपरक, विश्वसनीय और पाठक-केंद्रित पत्रकारिता में विश्वास रखती हैं तथा सरल, सटीक और प्रभावी समाचार लेखन को प्राथमिकता देती हैं.
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