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वासंतिक नवरात्र का चौथा दिन, मां कूष्माण्डा की पूजा, सभी विघ्न नाश कर सुख-समृद्धि प्रदान करता है माता का यह रूप

Updated at : 28 Mar 2020 3:35 AM (IST)
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वासंतिक नवरात्र का चौथा दिन, मां कूष्माण्डा की पूजा, सभी विघ्न नाश कर सुख-समृद्धि प्रदान करता है माता का यह रूप

नवरात्र के चतुर्थी तिथि को देवी के कुष्माण्डा स्वरूप की पूजा की जाती है. नैवेद्य के रूप में मक्खन, शहद और मालपुआ अर्पण करें. इससे मां प्रसन्न होकर आपके सभी विघ्न नाश कर के सुख-समृद्धि प्रदान करेंगी. बुद्धि का विकास होगा, मां की कृपा से निर्णय शक्ति में असाधारण विकास होता है.

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नवरात्र के चतुर्थी तिथि को देवी के कुष्माण्डा स्वरूप की पूजा की जाती है. नैवेद्य के रूप में मक्खन, शहद और मालपुआ अर्पण करें. इससे मां प्रसन्न होकर आपके सभी विघ्न नाश कर के सुख-समृद्धि प्रदान करेंगी. बुद्धि का विकास होगा, मां की कृपा से निर्णय शक्ति में असाधारण विकास होता है. देवी स्वयं कहा है- संसार के समस्त जीवों की स्पंदन-क्रिया मेरी शक्ति से ही होती है.

कूष्माण्डा दुर्गा : यह निश्चय है कि मेरे अभाव में वह नहीं हो सकती. मेरे बिना शिव दैत्यों का संहार नहीं कर सकते. या देवी सर्वभुतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता- शास्त्रोंमें शक्ति शब्द के प्रसंगानुसार अलग-अलग अर्थ किये गये हैं. तांत्रिक लोग इसी को पराशक्ति कहते हैं और इसी को विज्ञानानंदघन ब्रह्म मानते हैं. वेद,शास्त्र, उपनिषद्, पुराण आदि में भी शक्ति शब्द का प्रयोग देवी, पराशक्ति, ईश्वरी, मूलप्रकृति आदि नामों से विज्ञाननंदघन निर्गुण ब्रह्म एवं सगुण ब्रह्म के लिए भी किया गया है. विज्ञाननंदघन ब्रह्म का तत्व अत्यंत सूक्ष्म एवं गुह्य होने के कारण शास्त्रों में उसे नाना प्रकार से समझाने की चेष्टा की गयी है. इसलिए शक्ति नाम से ब्रह्म की उपासना करने से भी परमात्मा की ही प्राप्ति होती है.

एक ही परमात्मतत्व की निर्गुण, सगुण, निराकार, साकार, देव, देवी, ब्रह्मा, विष्णु, शिव, शक्ति, राम, कृष्ण आदि अनेक नाम-रूप भक्त लोग पूजा-उपासना करते हैं. वह विज्ञानानंदस्वरूपा महाशक्ति निर्गुणरूपा देवी जीवों पर दया करके स्वयं ही सगुणभाव को प्राप्त होकर ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूप से उत्पत्ति,पालन और संहारकार्य करती है. स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—तुम्हीं विश्वजननी मूलप्रकृति ईश्वरी हो, तुम्हीं सृष्टि की उत्पत्ति के समय आद्याशक्ति के रूप में विराजमान रहती हो और स्वेच्छा से त्रिगुणात्मिका बन जाती हो.

यद्यपि वस्तुतः तुम स्वयं निर्गुण हो तथापि प्रयोजनवश सगुण हो जाती हो. तुम परब्रह्मस्वरूप, सत्य, नित्य एवं सनातनी हो. परमतेजस्वरूप और भक्तों पर अनुग्रह करने के हेतु शरीर धारण करती हो. तुम सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी, सर्वाधार एवं परात्पर हो. तुम सर्व बीजस्वरूप, सर्वपूज्या एवं आश्रयरहित हो. तुम सर्वज्ञ, सर्वप्रकारसे मंगल करनेवाली एवं सर्वमंगलों की भी मंगल हो.

प्रस्तुतिः-डॉ.एन.के.बेरा

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Pritish Sahay

लेखक के बारे में

By Pritish Sahay

12 वर्षों से टीवी पत्रकारिता और डिजिटल मीडिया में सेवाएं दे रहा हूं. रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग से पढ़ाई की है. राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय विषयों के साथ-साथ विज्ञान और ब्रह्मांड विषयों पर रुचि है. बीते छह वर्षों से प्रभात खबर.कॉम के लिए काम कर रहा हूं. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में काम करने के बाद डिजिटल जर्नलिज्म का अनुभव काफी अच्छा रहा है.

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