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फैसले की घड़ी : जब लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या मामले पर दिया था ऐतिहासिक फैसला, हाइकोर्ट ने तीन पक्षों में बांटी थी जमीन

Updated at : 09 Nov 2019 4:02 AM (IST)
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फैसले की घड़ी : जब लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या मामले पर दिया था ऐतिहासिक फैसला, हाइकोर्ट ने तीन पक्षों में बांटी थी जमीन

साल 1989 में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद जमीन विवाद का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंचा था. हाइकोर्ट के समक्ष फैजाबाद की निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गयी थी. इसमें तीन पक्षकार थे- निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान. मंदिर और मस्जिद के दावों की सच्चाई क्या है, यह जानने के […]

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साल 1989 में राम जन्म भूमि और बाबरी मस्जिद जमीन विवाद का मामला इलाहाबाद हाइकोर्ट पहुंचा था. हाइकोर्ट के समक्ष फैजाबाद की निचली अदालत के फैसले को चुनौती दी गयी थी. इसमें तीन पक्षकार थे- निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान.
मंदिर और मस्जिद के दावों की सच्चाई क्या है, यह जानने के लिए हाइकोर्ट ने 2003 में विवादित जगह की खुदाई करवायी. खुदाई में मिले सबूतों की जांच के बाद पता चला कि मस्जिद वाली जगह पर कभी हिंदू मंदिर हुआ करता था. पुरातत्व विभाग की यह रिपोर्ट इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले का बड़ा आधार बना, जिसका जिक्र सुप्रीम कोर्ट में 40 दिनों तक चली नियमित बहस के दौरान भी किया गया और सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर गौर किया.
30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाइकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अयोध्या मामले पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. जस्टिस सुधीर अग्रवाल, जस्टिस एसयू खान और जस्टिस डीवी शर्मा की बेंच ने फैसले में 2.77 एकड़ की विवादित भूमि को तीन बराबर हिस्सों में बांट दिया था. इस फैसले के अंतर्गत राम लला विराजमान को राम मूर्ति वाली वह पहली जगह मिली, जहां पर भगवान राम के जन्मस्थान होने का दावा किया जाता है यानी वह जगह, जहां बाबरी मस्जिद हुआ करती थी. यह अंदर का हिस्सा है.
राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा (बाहर वाली भूमि) निर्मोही अखाड़ा को दिया गया और बाकी बचा हुआ तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को दिया गया, लेकिन इस फैसले को तीनों पक्षों में से किसी को स्वीकार नहीं हुआ. केस से जुड़ी तीनों पार्टियां निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान ने यह फैसला मानने से इनकार कर दिया था. हाइकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 अपील दायर की गयी. यह मामला पिछले नौ वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में लंबित था.
इलाहाबाद हाइकोर्ट ने पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को माना था आधार
हाइकोर्ट ने अपने फैसले में पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट को आधार माना था, जिसमें कहा गया था कि खुदाई के दौरान विवादित स्थल पर मंदिर के प्रमाण मिले थे. इसके अलावा भगवान राम के जन्म होने की मान्यता को भी शामिल किया गया था. हालांकि कोर्ट ने यह भी कहा था कि साढ़े चार सौ साल से मौजूद एक इमारत के ऐतिहासिक तथ्यों की भी अनदेखी नहीं की जा सकती.
30 सितंबर, 2010 को इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले ने जो फैसला दिया, उसे दिसंबर, 2010 में हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी. 9 मई, 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी स्थिति बरकरार रखने का आदेश दे दिया. तब से इस मामले में यथास्थिति बरकरार रखी गयी.
अयोध्या : समझें, किस जमीन पर िववाद
42 एकड़ जमीन राम जन्मभूमि न्यास से जुड़ी
सुन्नी वक्फ बोर्ड की जमीन
मानस भवन, संकट मोचन मंदिर, राम जन्म स्थान, कथा मंडप और जानकी महल की भूमि
मुकदमे की तीन मुख्य पार्टियां
हिंदू पक्ष में से एक निर्मोही अखाड़े ने 1959 में कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. सुन्नी वक्फ बोर्ड ने 1961 में और रामलला विराजमान ने 1989 में कोर्ट का रुख किया था. तीनों ने 2.77 एकड़ जमीन की मिलकियत का दावा किया.
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