World Photography Day: तस्वीरों के जरिए संताली महिलाओं को जानें

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संथाल संस्कृति की 5 पहचान: महिलाओं की नजर से त्योहार, कला, परिधान और नृत्य की कहानी

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संथाल संस्कृति सिर्फ त्योहारों और लोकनृत्य का नाम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जीवंत परंपरा है. सोहराय और बाहा से लेकर पांची, लोकचित्रकला और सामूहिक नृत्य तक- संथाल महिलाएं इस सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं.

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भारत की सांस्कृतिक विविधता में जनजातीय समुदायों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है. इन्हीं समुदायों में संथाल जनजाति अपनी समृद्ध परंपराओं, लोककला, संगीत, नृत्य और प्रकृति से गहरे जुड़ाव के लिए विशेष पहचान रखती है.

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मुख्य रूप से झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा सहित पूर्वी भारत में बसे संथाल समुदाय ने आधुनिकता के दौर में भी अपनी सांस्कृतिक पहचान और जीवन-पद्धति को काफी हद तक संरक्षित रखा है.

लेकिन संथाल संस्कृति की एक खास तस्वीर महिलाओं के नजरिए से भी सामने आती है. त्योहारों से लेकर कपड़ों, कला, नृत्य और सामुदायिक जीवन तक, महिलाएं इस सांस्कृतिक विरासत की महत्वपूर्ण वाहक रही हैं. आइए जानते हैं संथाल महिलाओं की 5 खास बातें.

नोट: मैंने यह photographs 2022 में ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट, रांची में काम करते हुए ली थी.

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1. सोहराय और बाहा: त्योहारों में महिलाओं की खास भूमिका

संथाल जीवन में त्योहार केवल धार्मिक या सांस्कृतिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि सामुदायिक मेल-मिलाप के अवसर भी हैं. सोहराय फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला प्रमुख त्योहार है. यह प्रकृति, कृषि और सामुदायिक जीवन के प्रति आभार का समय है.

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वहीं बाहा फूलों के मौसम का स्वागत करने वाला त्योहार है. इसे युवावस्था और उर्वरता से भी जोड़ा जाता है. ऐसे सामुदायिक आयोजनों में युवाओं के मिलने-जुलने और वैवाहिक संबंध बनने की सामाजिक परंपरा भी जुड़ी रही है.

महिलाओं के लिए ये त्योहार अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान को अभिव्यक्त करने का अवसर भी हैं- जहां गीत, नृत्य, पारंपरिक परिधान और सामूहिक उत्सव एक साथ दिखाई देते हैं.

2. संथाल कला: जब महिलाएं कहानी को रंगों में उतारती हैं

संथाल कला में रोजमर्रा के जीवन, प्रकृति, लोककथाओं और परंपराओं की झलक मिलती है. सरल आकृतियां, चमकीले रंग और जीवन से जुड़े विषय इसकी खास पहचान हैं.

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महिलाओं की भूमिका इस कला-परंपरा को आगे बढ़ाने में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही है. घर-आंगन और सामुदायिक जीवन से जुड़े चित्रों के माध्यम से वे केवल सजावट नहीं करतीं, बल्कि कहानियों, स्मृतियों और सांस्कृतिक अनुभवों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का काम भी करती हैं.

यानी संथाल कला को सिर्फ पेंटिंग के रूप में देखना अधूरा होगा. यह एक तरह की दृश्य लोक-स्मृति भी है.

3. पांची से पहचान तक: संथाल महिलाओं का पारंपरिक परिधान

संथाल समाज की वस्त्र परंपरा सादगी और स्थानीयता से जुड़ी है. महिलाओं का पारंपरिक परिधान पांची और पुरुषों का पारंपरिक वस्त्र धोती बताया जाता है. पांची के डिजाइन अपेक्षाकृत सरल होते हैं, लेकिन किनारों पर विपरीत रंगों और पारंपरिक रूपांकनों का इस्तेमाल इसे विशिष्ट बनाता है.

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महिलाओं के लिए कपड़ा केवल पहनावे का हिस्सा नहीं है. पारंपरिक वस्त्र उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जुड़ाव का भी प्रतीक है.

पारंपरिक बुनाई में स्थानीय संसाधनों और कौशल का इस्तेमाल होता रहा है. इस तरह वस्त्र-परंपरा महिलाओं के घरेलू कौशल, रचनात्मकता और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ती है.

संथाल जनजाति पर बनी मेरी डॉक्यूमेंट्री Part 1 यहां देखें.

4. नृत्य और संगीत: सामूहिकता की धड़कन

संथाल संस्कृति में नृत्य और संगीत का स्थान बेहद महत्वपूर्ण है. त्योहारों, विवाह और दूसरे सामुदायिक अवसरों पर समूह में किया जाने वाला संथाल नृत्य इसकी सबसे पहचानने योग्य परंपराओं में है.

महिलाएं समूह में एक-दूसरे के साथ ताल मिलाकर नृत्य करती हैं और तमाक और तुमडाक जैसे पारंपरिक वाद्यों की लय वातावरण को जीवंत बनाती है.

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यह नृत्य केवल मनोरंजन नहीं है. इसमें मौसम, प्रकृति, लोककथाओं और सामुदायिक जीवन की स्मृतियां भी मौजूद रहती हैं. इस अर्थ में महिलाएं जब नृत्य करती हैं तो वे केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बनतीं, बल्कि मौखिक परंपरा को जीवित रखने वाली पीढ़ी-दर-पीढ़ी की कड़ी भी बनती हैं.

5. शिल्प से संस्कृति तक: महिलाओं के हाथों में स्थानीय विरासत

संथाल समुदाय की शिल्प परंपरा में टोकरी बनाना, लकड़ी का काम और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का निर्माण शामिल है. इनमें धोद्रो बनाम जैसे वाद्य का विशेष सांस्कृतिक महत्व है.

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इन शिल्पों की खासियत यह है कि इनमें स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल होता है. इसलिए यह परंपरा कला के साथ-साथ प्रकृति के साथ संतुलित जीवन और स्थानीय संसाधनों के उपयोग की कहानी भी कहती है.

महिलाओं के दृष्टिकोण से देखें तो यही कौशल घरेलू जीवन, वस्त्र, कला और सामुदायिक संस्कृति के बीच एक पुल बनाते हैं. यही कारण है कि संथाल संस्कृति को समझते समय महिलाओं को केवल संस्कृति की ‘भागीदार’ नहीं, बल्कि उसकी संरक्षक और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने वाली प्रमुख कड़ी के रूप में देखना जरूरी है.

संथाल जनजाति पर बनी मेरी डॉक्यूमेंट्री Part 2 यहां देखें.


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