पूर्व सीएम चंपाई सोरेन ने सरकार पर लगाया अदिवासी विरोधी होने का आरोप
Published by : Sweta Vaidya Updated At : 05 Jun 2026 8:55 AM
चंपाई सोरेन
चंपाई सोरेन ने राज्य सरकार पर आदिवासी-मूलवासी विरोधी होने का आरोप लगाया है. चंपाई सोरेन ने कहा कि रांची के नगड़ी में बिना अधिग्रहण के आदिवासियों मूलवासियों की जमीन को रिम्स-2 के नाम पर छीनने का प्रयास कर रही यह आदिवासी विरोधी सरकार अब सारी सीमाएं लांघ रही है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
सरायकेला से प्रताप मिश्रा की रिपोर्ट
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने रांची के नगड़ी क्षेत्र में प्रस्तावित रिम्स-2 को लेकर राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने सोशल मीडिया पर इस बारे में लिखा है. पूर्व सीएम ने कहा कि रांची के नगड़ी में बिना अधिग्रहण के आदिवासियों मूलवासियों की जमीन को रिम्स-2 के नाम पर छीनने का प्रयास कर रही यह आदिवासी विरोधी सरकार अब सारी सीमाएं लांघ रही है. यह रांची शहर आदिवासियों और मूलवासियों की जमीन पर बसा हुआ है. एचईसी ने 7,200 एकड़ जमीन ली, लेकिन प्लांट मात्र 500 एकड़ में बनाया. लॉ यूनिवर्सिटी के लिए सवा सौ एकड़ जमीन ली गई. ऐसे कई अधिग्रहण हुए. आज तक किसी भी मामले में किसी को पुनर्वास नहीं मिला. जब HEC ने जमीनें वापस की, तो सरकार उसे रैयतों को वापस करने की जगह, उसे बेचने लगी. आपने हाई कोर्ट बनाया, विधानसभा बनाया, माननीयों के लिए बंगले भी बने, लेकिन उन रैयतों को क्या मिला, जिनकी जमीनों पर यह सब बन रहा था? उन्होंने आगे कहा कि रांची के शहरी क्षेत्र के तीनों विधानसभाओं (रांची, हटिया एवं कांके) में जो थोड़ी बहुत जमीन आदिवासियों/ मूलवासियों की बची है, उसे भी यह सरकार छीनने का षडयंत्र रच रही है. आपका मुख्य मकसद इस क्षेत्र से आदिवासियों/ मूलवासियों को उजाड़ना ही है क्या?
अधिग्रहण की प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हुई
चंपाई सोरेन ने कहा कि सन 1957-58 में हुए जिस अधिग्रहण की बात सरकार कर रही है, वह कभी पूरा ही नहीं हुआ. उस समय हुए विरोध के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने इस प्रक्रिया को रोकने की बात कही थी. उसके बाद यह प्रक्रिया रुकी और स्थानीय किसान 2012-13 तक उस भूमि की मालगुजारी भी देते रहे. फिर इस अधिग्रहण को पूरा मानना गलत होगा. भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 यह स्पष्ट करता है कि यदि रैयतों को मुआवजा नहीं मिला हो, अथवा उस भूमि पर सरकार का कब्जा ना हो तो अधिग्रहण की वह प्रक्रिया रद्द समझी जाती है. यहां न मुआवजा मिला, ना ही सरकार कब्जा कर पाई (वहां खेती हो रही थी), तो सिर्फ सरकार के कहने से अधिग्रहण मान लिया जाए क्या? रांची में कई जगह बंजर जमीन उपलब्ध है. यह सरकार HEC से सैकड़ों एकड़ जमीन ले चुकी है, दोबारा पांच सौ एकड़ से अधिक भूमि लेने की तैयारी में भी है, फिर वहां इस अस्पताल का निर्माण करवाने में क्या दिक्कत है?
स्वास्थ्य व्यवस्था सुधारने की बजाय नई इमारतों पर जोर
चंपाई सोरेन ने कहा राज्य में हर दूसरे दिन खाट पर मरीजों को अस्पताल ले जाते हुए तस्वीरें वायरल होती हैं. मरीजों को एम्बुलेंस मिलना लगभग असंभव है. चाईबासा में सरकारी अस्पताल में बच्चों को एचआईवी संक्रमित रक्त चढ़ा कर, उन्हें मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है. एक मजबूर पिता द्वारा अपने बच्चे का झोले में शव ले जाती तस्वीरें इनको शर्मसार नहीं करतीं? रांची में रिम्स की दुर्दशा किसी से छिपी हुई नहीं है. लेकिन फिर भी इन्हें उस व्यवस्था को ठीक नहीं करना है, एक नया अस्पताल बनाना है. क्यों? पिछले साल जमशेदपुर में MGM अस्पताल की नई बिल्डिंग बनी, लेकिन वहां क्या बदला? आज भी वहां ना तो दवाइयां हैं, ना टेस्ट की सुविधा, ना डॉक्टर मिलते हैं, ना स्टाफ? तो फिर क्या वहां बिल्डिंग इलाज करेगी? सरायकेला में मैंने एक बड़ा अस्पताल बनवाया था, डेढ़ साल से भवन बन कर तैयार है, लेकिन सरकार उसे शुरू नहीं करना चाहती. क्यों?
जमीन बचाने के लिए होगा महादरबार
पूर्व सीएम ने आगे कहा कि क्या भूमिपुत्रों की जमीनें लूटने के लिए झारखंड राज्य का निर्माण किया गया था? इस बदहाल व्यवस्था में किसानों को परेशान कर के, अथवा उन्हें भूमिहीन कर के सरकार को क्या मिलेगा? रांची का यह क्षेत्र शेड्यूल 5 एरिया में आता है, यहां सीएनटी एक्ट समेत तमाम कानून आदिवासियों/ मूलवासियों के संरक्षण के लिए बने हैं. उन कानूनों को बनाते समय ब्रिटिश लोगों ने हमारे अधिकारों को सम्मान दिया था, लेकिन, आज यह सरकार मानों हम लोगों को उजाड़ना ही अपना एकमात्र मकसद बना चुकी है. इस क्षेत्र में आदिवासियों के गांव अब खोजने से भी नहीं मिलते. क्या इसीलिए झारखंड अलग राज्य बनाया गया था? यह सरकार जिस भाषा को समझती है, इसे उसी भाषा में समझाया जायेगा. इस तानाशाही सरकार के खिलाफ राज्य भर के आदिवासी मूलवासी नगड़ी में महादरबार लगाएंगे, और लाखों लोग मिल कर इस जमीन को बचाएंगे, इन खेतों में हल चलाएंगे.
रांची के नगड़ी में बिना अधिग्रहण के आदिवासियों/ मूलवासियों की जमीन को रिम्स-2 के नाम पर छीनने का प्रयास कर रही यह आदिवासी विरोधी सरकार अब सारी सीमाएं लांघ रही है।
— Champai Soren (@ChampaiSoren) June 4, 2026
यह रांची शहर आदिवासियों एवं मूलवासियों की जमीन पर बसा हुआ है। एचईसी ने 7,200 एकड़ जमीन ली, लेकिन प्लांट मात्र 500… pic.twitter.com/ushCQmPeP2
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श्वेता वैद्य प्रभात खबर डिजिटल में जूनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में एक साल से अधिक का अनुभव है. पिछले करीब दो महीनों से वे झारखंड बीट पर सक्रिय रूप से काम कर रही हैं. इस दौरान वे राज्य से जुड़ी ताजा खबरों, लोगों से जुड़े मुद्दे और जरूरी जानकारियों पर आधारित स्टोरीज तैयार कर रही हैं. इससे पहले उन्होंने लाइफस्टाइल बीट के लिए भी कंटेंट लिखा. इस बीट में उन्होंने रेसिपी, फैशन, ब्यूटी टिप्स, होम डेकोर, किचन टिप्स, गार्डनिंग टिप्स और लेटेस्ट मेहंदी डिजाइन्स जैसे रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े विषयों पर रोचक और उपयोगी आर्टिकल लिखे. श्वेता की हर बार कोशिश यही रहती है कि बात आसान, साफ और सीधे तरीके से लोगों तक पहुंचे, जिससे कि हर कोई उसे बिना दिक्कत के समझ सके. कंटेंट राइटर के तौर पर उनका फोकस होता है कि कंटेंट सिंपल, रिलेटेबल और यूजर-फ्रेंडली हो.
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