धनंजय बाबू की कमी हमेशा खलेगी

Updated at : 03 Jan 2014 6:33 AM (IST)
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धनंजय बाबू की कमी हमेशा खलेगी

– शैलेंद्र महतो – वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेसी नेता धनंजय महतो के निधन से एक ऐसे अध्याय की समाप्ति हो गयी है, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भागीदारी तदुपरांत राजनीति में प्रवेश आदि पृष्ठ शामिल है. वे एक ऐसे महासेतु थे, जो आज की पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम की […]

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– शैलेंद्र महतो –

वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेसी नेता धनंजय महतो के निधन से एक ऐसे अध्याय की समाप्ति हो गयी है, जिसमें स्वतंत्रता आंदोलन और महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भागीदारी तदुपरांत राजनीति में प्रवेश आदि पृष्ठ शामिल है. वे एक ऐसे महासेतु थे, जो आज की पीढ़ी को स्वतंत्रता संग्राम की पीढ़ी से जोड़ते थे.

उन्होंने पिछले सात दशकों में बदलते परिदृश्य और घटनाओं के साथी रहे और एक कर्मठ गांधीवादी नेता के रूप में वर्त्तमान पीढ़ी के राजनेताओं को मार्गदर्शन एवं दृष्टि प्रदान करते थे. 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाते हुए अंग्रेजों द्वारा प्रताड़ित हुए और उन्हें जेल जाना पड़े. वे एक ऐसा व्यक्तित्व पूरे झारखंड में शायद अंगुली में गिने जा सकते हैं. उनके दर्शन मात्र से एक विशेष स्फूर्ति उत्साह और आनंद की प्राप्ति

मुझे होती थी. वे लगातार सक्रिय राजनीति में अपनी अहम भूमिका निभाते रहे.

सन 1956 में जब मानभूम का विभाजन हुआ, पुरुलिया को पश्चिम बंगाल में मिला दिया गया, उस समय मानभूम जिला विभाजन के विरोध में उन्होंने बड़े आंदोलन की अगुवाई की थी.

1957 में वे चांडिल विधान सभा के विधायक के रूप में निर्वाचित हुए. 1976 में बिहार विधान परिषद के सदस्य बने. उसके बाद आयडा के चेयरमैन के रूप में कई साल तक रहे. इस महान राष्ट्रभक्त स्वतंत्रता सेनानी राजनेता की कमी झारखंड को हमेशा

खलेगी. सामाजिक आंदोलन के नेता के रूप में उनकी सर्वमान्य छवि थी. गरीबों के प्रति उनके दिलों में सम्मान देखते बनता था. जब भी कोई उनके पास किसी काम के लिए जाता था तो उन्हें बिना खाने खिलाये हुए वे जाने नहीं देते थे.

80 के दशक में जब वे पटना में रहते थे तो उस वक्त वहां जानेवालों को मछली-भात खिलाकर वे विशेष खातिरदारी करते थे. गांव के लोगों को उनके हक और अधिकार के प्रति वे हमेशा सचेत किया करते थे. हर खेत को पानी और हर हाथ को काम कैसे मिले, इसकी वकालत हमेशा किया करते थे.

उनकी एक बात काफी गौर करनेवाली मैंने देखी कि जिस मामले में वे किसी अधिकारी के पास पैरवी करते थे तो मुलाकात के दौरान अधिकारी व जिसकी पैरवी करते थे उससे काम के बारे में अपडेट पूछते थे. अगर उसका काम नहीं हुआ तो वे फिर उसके लिए लग जाते थे. ऐसा जुनून काफी कम लोगों में देखने को मिलता है. समाज के मामलों में भी मुख्य सलाकार-अभिभावक की भूमिका में दिखायी देते थे. उनकी सलाह मील का पत्थर साबित होती थी.

(पूर्व सांसद शैलेंद्र महतो ने जैसा संजीव भारद्वाज को बताया)

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