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.सोहराय पर्व की तैयारियों से आदिवासी अंचल में उत्सव का माहौल

प्रकृति, संस्कृति और कृतज्ञता का छह दिवसीय महापर्व

बोरियो

जिलेभर में धान की कटनी समाप्त होते ही आदिवासी समाज में पारंपरिक सोहराय पर्व को लेकर चहल-पहल शुरू हो जाती है. आदिवासी बहुल बोरियो प्रखंड में हर ओर सोहराय की तैयारियों की सुगबुगाहट दिखाई देने लगी है. पर्व की तैयारियों के तहत घरों की साफ-सफाई और नवीकरण का कार्य प्रारंभ हो गया है. क्षेत्र में अधिकांश घर मिट्टी के बने होने के कारण मिट्टी का लेपन, गोबर की निपाई तथा दीवारों पर पारंपरिक एवं आकर्षक चित्रांकन किया जा रहा है. मिट्टी की सौंधी सुगंध और प्राकृतिक रंगों से बनी कलाकृतियां वातावरण को मनोहारी बना देती हैं. ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा क्षेत्र उत्सव की रंगीन छटा में डूब गया हो. सोहराय पर्व आदिवासी समाज का अत्यंत विशेष और अनोखा त्योहार है. यह पर्व केवल उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि कार्यों में सहभागी मवेशियों, देवी-देवताओं, पारंपरिक संस्कृति, सामाजिक एकता और कृतज्ञता का प्रतीक है. इस पर्व में पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सभी को समान रूप से आनंद और सहभागिता का अधिकार प्राप्त होता है. नाच-गान, पारंपरिक व्यंजन, मेल-मिलाप और सामूहिक उल्लास इस पर्व की विशेष पहचान है. सोहराय पर्व कुल छह दिनों तक मनाया जाता है, जिसमें आदिवासी समाज की कई विशिष्ट परंपराएं निभायी जाती है. पहला दिन पर्व की शुरुआत उम से होती है. इस दिन गांव के नायके और उनके गोड़ेत गांव के पुरुषों के साथ पश्चिम दिशा की ओर जाकर खुले स्थान पर पूजा करते हैं. पूजा स्थल पर अंडा रखकर मवेशियों को छोड़ा जाता है. जिस मवेशी के पैर से अंडा टूटता है, उसे लक्ष्मी स्वरूप मानकर पूजा की जाती है. दूसरे दिन बोंगा पूजा की जाती है और सगे-संबंधियों को आमंत्रित किया जाता है, विशेष रूप से घर की बहनों और बहनोइयों को. तीसरा दिन खूंटव के दिन गांव के सभी लोग अपने-अपने मवेशियों को नहलाकर घर के बाहर खूंटे से बांधते हैं. इस अवसर पर मवेशियों के साथ बहनोइयों द्वारा हंसी-ठिठोली और पारंपरिक खेल-कूद किए जाते हैं. चौथा दिन जाली के दिन गांव के युवक टोली बनाकर घर-घर घूमते हैं और लोगों की बाड़ियों से साग-सब्जी एकत्र कर जोग मांझी के घर पहुंचाते हैं. वहां सभी साग-सब्जियों को मिलाकर सामूहिक रूप से खिचड़ी बनायी जाती है. पांचवां दिन तालाब या नदी में सामूहिक रूप से मछली पकड़ने की परंपरा निभायी जाती है. छठा दिन सोहराय के अंतिम दिन सकरात मनाया जाता है. इस दिन गांव के युवक सुबह शिकार के लिए निकलते हैं. दोपहर बाद लौटकर केले के पेड़ और पारंपरिक पकवानों के साथ गांव की पश्चिम दिशा में जाते हैं. वहां केले के पेड़ को खड़ा कर उसके ऊपर पकवान रखे जाते हैं और युवक तीर-धनुष से बारी-बारी से निशाना लगाते हैं. जिस युवक का तीर पेड़ पर लगता है, उसे जोग मांझी कंधे पर उठाकर मांझी स्थान तक लाते हैं. इस दौरान चावल से बनी हंडिया के साथ जमकर नाच-गान होता है. इसी के साथ आदिवासी समाज का यह छह दिवसीय पारंपरिक सोहराय पर्व हर्षोल्लास के साथ संपन्न हो जाता है.

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