पानी के लिए मचा हाहाकार
Updated at : 19 May 2017 1:18 AM (IST)
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लकड़ा पहाड़ अर्जुनपुर पंचायत के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से महरूम प्रखंड क्षेत्र के अर्जुनपुर पंचायत अंतर्गत लकड़ा पहाड़ पर रहने वाले आदिम जनजाति के लोगों को आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है. साथ ही यहां के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से मेहरूम हैं. पतना : […]
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लकड़ा पहाड़ अर्जुनपुर पंचायत के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से महरूम
प्रखंड क्षेत्र के अर्जुनपुर पंचायत अंतर्गत लकड़ा पहाड़ पर रहने वाले आदिम जनजाति के लोगों को आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है. साथ ही यहां के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से मेहरूम हैं.
पतना : प्रखंड क्षेत्र के अर्जुनपुर पंचायत अंतर्गत लकड़ा पहाड़ पर रहने वाले आदिम जनजाति के लोगों को आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी पीने का पानी नहीं मिल पा रहा है. साथ ही यहां के ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं से मेहरूम हैं.
प्रखंड मुख्यालय से 9 किमी की दूरी पर जमीन से लगभग 700 फीट की ऊंचाई पर स्थित लकड़ा पहाड़ पर आदिम जनजाति के 30 घर हैं. जिसकी आबादी लगभग 300 के आसपास है. सरकार द्वारा आदिम जनजाति के लोगों के उत्थान के लिए चलायी जा रही योजनाओं का लाभ पहाड़ पर बसे लोगों को पदाधिकारियों के निष्क्रियता के कारण नहीं मिल पा रहा है. सरकार की महत्वाकांक्षी योजना प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ भी पहाड़ के लोगों को नहीं मिला है.
गरमी पड़ते ही पहाड़ पर रहने वाले पहाड़िया जनजाति के लोगों को पेयजल को लेकर जूझना पड़ रहा है. 300 की आबादी में पेयजल व स्वच्छता विभाग के द्वारा पेयजल की कोई व्यवस्था अब तक नहीं की गयी है. पहाड़िया जनजाति की महिलाएं को कड़ी धूप में पहाड़ से डेढ़ किमी की दूरी पर स्थित झरना का दूषित पानी पहाड़ की चढ़ाई चढ़ कर लाना पड़ता है. इससे पता चलता है कि प्रखंड क्षेत्र में पेयजल व स्वच्छता विभाग सिर्फ कागजों पर चल रहा है. शुद्ध पेयजल नहीं मिलने के कारण अक्सर पहाड़िया जनजाति के लोग डायरिया से पीड़ित होकर अपनी जान गंवा देते हैं.
पहाड़ पर नहीं है कोई स्वास्थ्य सुविधा : सरकार लोगों को स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए लाखों रुपये खर्च कर रही है. लेकिन लकड़ा पहाड़ पर बसने वाले आदिम जनजाति के लोगों को किसी प्रकार की स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल रही है. यहां तक की बच्चों का टीकाकरण भी विभाग के द्वार नहीं किया जा रहा है. स्वास्थ्य विभाग के द्वारा खोले गये उपस्वास्थ्य केंद्र भी प्राय: बंद रहते हैं. जिसके कारण बीमार पड़ने पर लोग पहाड़ से नीचे उतर कर झोलाछाप चिकित्सकों से इलाज करवाते हैं.
लकड़ा पहाड़ तक पहुंचने के लिये सरकार के द्वारा अब तक न तो पक्की सड़क की व्यवस्था की गयी है. और न ही कोई पहल किया जा रहा है. पहाड़ों के पगडंडी के सहारे पथरीले रास्तों से होकर गांव तक लोगों को पहुंचना पड़ता है. उक्त पहाड़ पर ग्रामीण आज भी अपनी जरूरत और मुलभूत सुविधाओं से वंचित हैं. ऐसे में जब गांव तक पहुंचने के लिये सरकार सड़क तक नहीं बना पायी है तो हम विकसित भारत की परिकल्पना कैसे कर सकते हैं.
कहते हैं आदिम जनजाति के लोग
लकड़ा पहाड़ पर रहने वाले मेसी पहाड़िया, परमीला मालतो, सुक्खु पहाड़िया, रानी पहाड़िया, जवाहर मालतो, चांदु पहाड़िया, सुशीला पहाड़िया, सूरजा पहाड़िया आदि ने बताया कि हमलोगों को पीने व अन्य जरूरत के लिये पानी पहाड़ के नीचे झरना से लाना पड़ता है. जिससे हमलोगों को काफी कठिनाई होती है. सरकार के द्वारा विद्युत की व्यवस्था तो की गयी लेकिन कभी-कभार ही बिजली आती है. वहीं उनलोगों ने कहा कि वृद्धा पेंशन व विधवा पेंशन भी सभी जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है.
क्या कहते हैं पदाधिकारी
जो भी समस्याएं संज्ञान में आयी है. कर्मचारियों के भेज कर पुरी जानकारी लेकर प्रखंड में जो भी योजनाएं चल रही है. उसका लाभ पहाड़ पर रहने वाले लोगों तक पहुंचाया जायेगा.
-नरेश कुमार मुंडा, प्रखंड विकास पदाधिकारी
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