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प्रवचन : योग मार्ग पर चलने से आंतरिक मिलन का होता है अनुभवयोग मार्ग में कई व्यवस्थित चरण है. इस पथ पर चलने से आंतरिक अनुभव के क्षणों तथा आंतरिक मिलन का अनुभव होता है. इस प्रकार योग लक्ष्य एवं मार्ग दोनों हैं. प्रतिदिन एक घंटा आसन-प्राणायाम करना तथा दस मिनट मंत्र जप करना ही […]
प्रवचन : योग मार्ग पर चलने से आंतरिक मिलन का होता है अनुभवयोग मार्ग में कई व्यवस्थित चरण है. इस पथ पर चलने से आंतरिक अनुभव के क्षणों तथा आंतरिक मिलन का अनुभव होता है. इस प्रकार योग लक्ष्य एवं मार्ग दोनों हैं. प्रतिदिन एक घंटा आसन-प्राणायाम करना तथा दस मिनट मंत्र जप करना ही योग नहीं है. ये अभ्यास जीवन को बेहतर बनाने, विश्राम को बढ़ाने, एकाग्रता तथा प्रत्येक कार्य में ध्यान करने के साधन हैं. यह कर्मयोग है.कर्मयोग : कर्मयोग का अर्थ ध्यानमय गतिशीलता तथा निस्वार्थ सेवा है. व्यक्ति जब काम करता है तो उसका शरीर व मन कार्य तथा चिंतन में लगे रहते हैं. कार्य करने के बावजूद भी वह ध्यान की अवस्था में रहता है. वह कहता है-मैं जानता हूं कि मैं सजग हूं. वह जो भी कार्य करता है उसमें उसका अहं लेशमात्र भी नहीं होता. वह कार्य के आनंद के लिये कार्य करता है. उसका लक्ष्य कार्य के बदले में कुछ पाना नहीं होता. उसे कार्य करने में आनंद आता है, अत: इसके फलस्वरूप काम का गुण बढ़ जाता है.
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