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कैसे बदला चुनाव : पहले कार्यकर्ताओं के समर्पण से जीतते थे चुनाव, अब खर्च का बोलबाला

Updated at : 25 Mar 2019 8:27 AM (IST)
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कैसे बदला चुनाव : पहले कार्यकर्ताओं के समर्पण से जीतते थे चुनाव, अब खर्च का बोलबाला

दावर इमरान 20 हजार रुपये खर्च कर सेत हेंब्रम बने थे राजमहल के सांसद साहेबगंज : जिला के बाकुड़ी जैसे सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहनेवाले सेत हेंब्रम ने 1969 में हूल झारखंड पार्टी के जोड़ा पत्ता से राजनीति में कदम रखा. पहली बार ही चुनाव में अविभाजित बिहार के समय बोरियो विधानसभा से विधायक का […]

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दावर इमरान
20 हजार रुपये खर्च कर सेत हेंब्रम बने थे राजमहल के सांसद
साहेबगंज : जिला के बाकुड़ी जैसे सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहनेवाले सेत हेंब्रम ने 1969 में हूल झारखंड पार्टी के जोड़ा पत्ता से राजनीति में कदम रखा. पहली बार ही चुनाव में अविभाजित बिहार के समय बोरियो विधानसभा से विधायक का चुनाव जीता. उनके राजनीतिक कैरियर संघर्ष वाला रहा है. उन्होंने 1969 से राजनीति शुरू की. 1980 के लोकसभा चुनाव में वह राजमहल सीट से सांसद बने. उन्होंने बताया कि पहली बार विधायक बनने में महज 5000 रुपये खर्च किये. 1972 से 77 के दौरान जब मैं विधायक बनकर बिहार सरकार में मंत्री के पद पर रहा. उसके बाद कांग्रेस पार्टी ने मुझे 80 के दशक में सांसद का टिकट दिया. उस समय में 20 से 25 हजार रुपये खर्च कर सांसद भी बन गया.
कार्यकर्ता ईमानदारी से करते थे काम
श्री सेत ने बताया कि अब व पहले के कार्यकर्ताओं में जमीन व आसमान का फर्क है. पहले का हर व्यक्ति अपने आप को भी जनप्रतिनिधि समझता था. यही वजह था कि वे चुनाव के दौरान अपना पूरा समय अपने नेता के लिए देते थे. अपना खा-पीकर व पैसा खर्च कर ईमानदारी से पार्टी का काम करते थे. कार्यकर्ताअों के समर्पण से ही हम चुनाव जीतते थे. अब कार्यकर्ता भी स्वार्थी हो गये हैं. यही कारण है कि हजारों का चुनाव करोड़ों तक पहुंच गया है.
विकास के मुद्दे पर लड़ा जाता था चुनाव
आज के चुनाव व पहले के चुनाव में बड़ा बदलाव आया है. पहले का चुनाव सिर्फ विकास के मुद्दे पर होता था. कौन प्रत्याशी नि:स्वार्थ भाव से काम किया है. किनका काम अच्छा है. जनता परख करती थी. इसके उलट आज कार्यकर्ता से लेकर आमलोगों को रुपये का लालच दिया जाता है. विकास का मुद्दा गौण हो गया है.
एक कार से तय किया राजनीति का सफर
राजनीति में आने से पहले से ही सेत हेंब्रम के पास एंबेसडर कार थी. वे क्षेत्र के एक जमींदार व पढ़े-लिखे खानदान में से थे. उन्होंने बताया कि पुरानी एंबेसडर कार से ही 1969 से लेकर 1990 तक का राजनीतिक सफर तय किया. उस जमाने में बरहरवा या फिर साहेबगंज आते-जाते थे. वहां से ब्रह्मपुत्र मेल पकड़ कर दिल्ली जाते थे.
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