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Women's Day Special: झारखंड की महिलाएं किसी से कम नहीं, हर क्षेत्र में बजा रही डंका, पढ़े यह खास रिपोर्ट

Updated at : 01 Mar 2023 12:50 PM (IST)
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Women's Day Special: झारखंड की महिलाएं किसी से कम नहीं, हर क्षेत्र में बजा रही डंका, पढ़े यह खास रिपोर्ट

Women's Day Special: झारखंड की महिलाएं खेल का मैदान हो, लेखन की दुनिया हो या फिर हो राजनीति और नृत्य-संगीत और कला की दुनिया. हर क्षेत्र में इनका डंका बज रहा है. इस नारी शक्ति का प्रतीक है आठ मार्च. इस दिन को पूरी दुनिया महिला दिवस के रूप में सेलिब्रेट करती है.

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Women’s Day Special: महिलाएं हर क्षेत्र में काबिलियत से सफलता की नयी सीढ़ियां चढ़ रही हैं. झारखंड और रांची की महिलाएं भी किसी से कम नहीं हैं. खेल का मैदान हो, लेखन की दुनिया हो या फिर हो राजनीति और नृत्य-संगीत और कला की दुनिया. हर क्षेत्र में इनका डंका बज रहा है. इस नारी शक्ति का प्रतीक है आठ मार्च. इस दिन को पूरी दुनिया महिला दिवस के रूप में सेलिब्रेट करती है.

रिंपी खुद प्रोफेशनल
डिग्री नहीं ले सकीं

पीस रोड निवासी रिंपी रॉय बच्चों के लिए म्यूजिक स्कूल चला रही हैं. गिटार, पियानो और अन्य म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट पर अच्छी पकड़ है. हालांकि इसके लिए कही से कोई प्रोफेशनल डिग्री नहीं ली. इसका मलाल आज भी है. वह कहती हैं : हमारे बच्चे रांची जैसी जगह से म्यूजिक का प्रोफेशनल कोर्स कर सकें और उन्हें स्कॉलरशिप मिले, इसी उद्देश्य के साथ 2015 में म्यूजिक सेंटर की शुरुआत की. जहां बच्चों को म्यूजिक की हर विद्या सिखायी जाती है. हर तरह का वाद्य यंत्र सिखाया जाता है. यहां के बच्चों के लिए लंदन यूनिवर्सिटी से परीक्षक आते हैं. उनकी बेटी अमेरिका के बच्चों को पियानो सीखा रही हैं. बेटा भी अच्छा गिटार बजाता है.

पढ़ाना छोड़ नृत्य में सबीता ने बनायी अपनी पहचान

कुसई की सबीता मिश्रा ने ओडिसी नृत्य को नयी पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभायी है. झारखंड- बिहार में ओडिसी नृत्य अकादमी की स्थापना कर इस नृत्य को आगे बढ़ा रही हैं. वह कहती हैं : आठ वर्ष की उम्र में गुरु रघुनाथ दत्ता से कला विकास केंद्र कटक में ओडिसी नृत्य की शिक्षा लेनी शुरू की. इसके बाद गांधर्व संगीत महाविद्यालय से नृत्य प्रवीण डिग्री व प्रयाग संगीत समिति इलाहाबाद से नृत्य प्रभाकर की उपाधि मिली. इसके अलावा कई अवार्ड भी मिल चुके हैं. देश-विदेश में नृत्य का दमखम दिखा चुकी हैं. सबीता मिश्रा ने बताया : मैंने प्राणी विज्ञान में स्नातकोत्तर किया है. एमफिल भी कर चुकी हूं. इसके बाद ओडिसा लोक सेवा संस्थान द्वारा चयनित तीन सरकारी महाविद्यालयों में अध्यापक के रूप में सेवा दी और सात वर्षों तक अध्यापन से जुड़ी रही. इसके बाद ओडिसी नृत्य में करियर को आगे बढ़ाने में लग गयी. 1990 से पटना में नृत्य ग्राम संस्थान की स्थापना की.

मां की ख्वाहिश पूरी करने के
लिए मोनिका ने सीखा कथक

दीपाटाली निवासी मोनिका डे एक बेहतरीन कथक नृत्यांगना हैं. उनका रंग-मंच से गहरा जुड़ाव है. कथक में ऑल इंडिया गोल्ड मेडलिस्ट रही हैं. रवींद्र नृत्य में डिप्लोमा भी किया है. जेवीएम श्यामली की शिक्षिका मोनिका डे के गुरु हैं विपुल दास, जिनसे उन्होंने कथक की बारीकियां सीखी हैं. वह कहती हैं : बचपन में ही मां का देहांत हो गया. मां का सपना था कि मैं कथक नृत्यांगना बनूं. इस कारण बड़ी दीदी ने नृत्य सिखाने में सहयोग किया. पहला बड़ा मौका कोलकाता के साल्ट लेक में आयोजित नृत्य नाटक श्यामा में मिला. फिर यूनियन क्लब रांची और आइआइसीएम जैसे संस्थानों में प्रस्तुति दी. अभी अंतरराष्ट्रीय कथक नर्तक संदीप मल्लिक के साथ प्रैक्टिस कर रही हैं.

बीटेक की पढ़ाई कर चुकीं नमिता तिर्की संगीत में छेड़ रहीं तराना

ये हैं नमिता तिर्की. झारखंड के बेहतरीन भक्ति गायकों में शुमार. मूल रूप से लातेहार की रहनेवाली नमिता अपनी मातृभाषा नागपुरी के साथ-साथ हिंदी और अंग्रेजी में भी गीत गाती हैं. खास बात है कि उन्होंने बीटेक की पढ़ाई की है और वर्तमान में एक निजी कंपनी के मानव संसाधन विभाग में कार्यरत हैं. फिर संगीत से उनका नाता अटूट है. लातेहार से स्कूलिंग हुई. फिर रांची स्थित उर्सुलाइन कॉन्वेंट से इंटर की पढ़ाई की. स्कूल और कॉलेज में म्यूजिक के लिए कई अवार्ड हासिल कर चुकी हैं. अभी गुरु झारना मजूमदार से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रही हैं. नमिता ने कहा कि 25 से ज्यादा डिवोशनल गीत का एलबम तैयार कर चुकी हैं. वहीं करीब 50 नागपुरी एलबम में भी अपनी आवाज दे चुकी हैं.

जन्म से ही नहीं है एक हाथ, लेकिन फाल्गुनी की आवाज सुरीली है

गुजरात की फाल्गुनी कुमार रावल उन महिलाओं के लिए मिसाल हैं, जो खुद को दिव्यांग होने के कारण कमजोर व निर्बल समझ लेती हैं. लेकिन फाल्गुनी ने अपनी कमजोरी को ही हथियार बनाया और पहचान बनाने में जुट गयीं. वह कहती हैं : जन्म के बाद से ही एक हाथ नहीं था. हालांकि भगवान ने एक हाथ भले नहीं दिया हो, लेकिन मधुर स्वर जरूर दिये. मां के प्रोत्साहन से बचपन से ही संगीत सीखने लगी. गुजरात से ही डिप्लोमा इन मेंटल रिटार्डेशन की पढ़ाई की. फिर भाव नगर में मानिसक रूप से अस्वस्थ बच्चों के लिए काम करने लगी. शादी के बाद रांची आना पड़ गया, जिस कारण जॉब छूट गयी. लेकिन संगीत और स्पेशल बच्चों के प्रति लगाव कम नहीं हुआ. गांधर्व संगीत महाविद्यालय से क्लासिकल म्यूजिक में डिग्री हासिल की. क्लासिकल संगीत में ही ग्रेजुएशन और मास्टर की प पढ़ाई की. अब म्यूजिक थेरेपी की पढ़ाई कर रही हैं. यह म्यूजिक थेरेपी स्पेशल बच्चों और सीनियर सिटीजन के लिए बेहद लाभकारी है.

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