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रिम्स में बिना अनुमति कैंसर मरीजों पर हो रहा था ड्रग ट्रायल, विभागाध्यक्ष हटाये गये

इसमें पाया गया कि दवा कंपनी इंटास का प्रतिनिधि डॉ कुणाल कुमार अनधिकृत रूप से कैंसर मरीजों के परिजनों से ड्रग ट्रायल वाली दवा बेच रहा था. इसके अलावा वार्ड के फ्रीज में भी दवा रखी हुई मिली.

राजीव पांडेय, रांची:

ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआइ) की अनुमति के बिना ही रिम्स के कैंसर विभाग में मरीजों पर दवा के क्लिनिकल ट्रायल का मामला पकड़ा गया है. डीसीजीआइ की रिपोर्ट के आधार पर रिम्स प्रबंधन ने अंकोलाॅजी के विभागाध्यक्ष सह मुख्य शोधकर्ता डॉ अनूप कुमार को पद से हटा दिया है. उनकी जगह डॉ रश्मि सिंह को विभागाध्यक्ष बनाया गया है. यह आदेश रिम्स निदेशक डॉ राजीव कुमार गुप्ता ने 29 दिसंबर 2023 को ही जारी कर दिया था. इधर, डीसीजीआइ ने 26 बिंदुओं की अपनी रिपोर्ट में ड्रग के क्लिनिकल ट्रायल के नियमों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया है. यह भी पता चला है कि मुख्य शोधकर्ता ने शोध के नाम पर कंपनी से मिलनेवाला मोटी रकम अपने ही खाता में ट्रांसफर करायी है.

रिपोर्ट में उल्लेख है कि उक्त मामले की जानकारी मिलने पर 20 और 21 सितंबर 2022 को केंद्रीय औषधि निरीक्षक डॉ जयज्योति राय, अरविंद कुमार पनवर, रामकुमार झा और डॉ कल्याण कुसुम मुखर्जी ने रिम्स के कैंसर विभाग का निरीक्षण किया था. निरीक्षण में कई खामियां पायी गयी थीं. जांच के बाद केंद्रीय औषधि निरीक्षकाें की टीम लौट गयी और सात पन्ने की रिपोर्ट तैयार की. वहीं, राज्य औषधि निदेशालय के निर्देश पर औषधि निरीक्षक रामकुमार झा ने 18 जुलाई 2023 को निरीक्षण किया. इसमें पाया गया कि दवा कंपनी इंटास का प्रतिनिधि डॉ कुणाल कुमार अनधिकृत रूप से कैंसर मरीजों के परिजनों से ड्रग ट्रायल वाली दवा बेच रहा था. इसके अलावा वार्ड के फ्रीज में भी दवा रखी हुई मिली. जांच में दवा का कोई लेखाजोखा और रखरखाव की जानकारी नहीं मिली.

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दवा कंपनी ने डीसीजीआइ से नहीं ली अनुमति

दवा निर्माता कंपनी ‘इंटास’ ने कैंसर की दवा लिपोसोमल डॉक्सीटेक्सल इंजेक्शन के ट्रायल की अनुमति डीसीजीआइ नहीं ली थी. वहीं, रिम्स में कैंसर के जिन मरीजों पर ड्रग ट्रायल किया गया, उनको भी इसकी जानकारी नहीं दी गयी. सामान्य कैंसर के मरीजों में भी इस दवा के उपयोग का आरोप लगा है. वहीं, मुख्य शोधकर्ता ने भी दवा के उपयोग और शोध स्थल के लिए डीसीजीआइ से अनुमति नहीं ली थी. हालांकि, कागजों पर मरीज व उनके परिजन से अनुमति लेने की बात दर्शायी जा रही है. लेकिन, इसकी विश्वसनीयता पर संदेह है. नियमानुसार किसी दवा के ट्रायल के दौरान मरीज को हर तरह की सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध करायी जाती हैं. इसमें मरीज का खाना-पीना, रहना, जांच, अटेंडेंट का खर्च आदि शामिल हैं. साथ ही मरीजों को शोध की गंभीरता के अनुसार एक निश्चित राशि का भुगतान करना होता है. लेकिन इन सभी मानकों का उल्लंघन किया गया. इतना ही नहीं, दवा के एवज में मरीजों से मोटी रकम भी वसूली गयी.

ड्रग ट्रायल की क्या है प्रक्रिया

मरीजों पर किसी भी नयी दवा का क्लिनिकल ट्रायल करने के लिए कई नियमों का पालन करना होता है. ट्रायल के लिए मरीज से सहमति लेनी होती है. किसी प्रकार की समस्या होने पर पूरी जिम्मेदारी उस कंपनी और शोधकर्ताओं पर होती है.

डीसीजीआइ की रिपोर्ट पर कार्रवाई

– कंपनी ने डीसीजीआइ से नहीं ली थी अनुमति, मरीजों को भी नहीं थी ड्रग टायल की जानकारी

– कैंसर की दवा लिपोसोमल डॉक्सीटेक्सल इंजेक्शन का कैंसर मरीजों पर चल रहा था ड्रग टायल

– मरीजों से दवा के लिए वसूली गयी रकम, मुख्य शोधकर्ता ने शोध के लिए अपने खाते में मंगाये पैसे

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