झारखंड में बालू को लेकर बड़ा खेल, स्टॉक यार्ड में बालू ही नहीं तो नीलामी का टेंडर कैसे निकाला

Published by : AmleshNandan Sinha Updated At : 24 May 2026 6:10 AM

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स्टॉक यार्ड में मौजूद बालू

Ranchi: झारखंड में बालू नीलामी प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं. स्टॉकयार्ड में बालू नहीं है फिर भी नीलामी का टेंडर निकाल दिया गया है. विभाग बताता है कि स्टॉकयार्ड में 13 लाख सीएफटी से ज्यादा बालू मौजूद है, लेकिन जमीन पर काफी कम बालू है. पूरी रिपोर्ट नीचे पढ़ें...

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सुनील चौधरी
Ranchi: झारखंड में बालू को लेकर एक ऐसा खेल सामने आया है, जिसने सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर खोलकर रख दिया है. झारखंड राज्य खनिज विकास निगम यानी जेएसएमडीसी दावा कर रहा है कि संताल परगना के चार जिलों – दुमका, देवघर, जामताड़ा और गोड्डा के अलग-अलग स्टॉक यार्ड में 13 लाख 30 हजार सीएफटी से ज्यादा बालू मौजूद है. इसी बालू की बिक्री के लिए 19 मई को टेंडर भी जारी कर दिया गया और 5 जून 2026 को इसकी नीलामी होनी है, लेकिन जब ग्राउंड पर जाकर पड़ताल की गई, तो तस्वीर सरकारी फाइलों से बिल्कुल उलट दिखाई दी. कई स्टॉक यार्ड ऐसे मिले जहां बालू नाममात्र का था और कई जगह मैदान पूरी तरह खाली पड़े थे. अब सवाल उठ रहा है कि जब जमीन पर बालू है ही नहीं, तो आखिर करोड़ों रुपये की नीलामी किस चीज की हो रही है?

सारठ में 2.5 लाख सीएफटी बालू का दावा, लेकिन बालू नदारद

देवघर जिले के सारठ थाना क्षेत्र के रानीगंज मौजा में जेएसएमडीसी ने दावा किया कि वहां 2,50,400 सीएफटी बालू मौजूद है, जिसकी कीमत 30 लाख रुपये से ज्यादा बताई गई है, लेकिन जब मौके पर निरीक्षण किया गया, तो वहां मुश्किल से कुछ हजार सीएफटी बालू बचा दिखाई दिया. इसी तरह मरगोमुंडा अंचल के पांडया में रिकॉर्ड में हजारों सीएफटी बालू दर्शाया गया, जबकि जमीन पर मैदान सपाट मिला. करौं अंचल के सरभंगा में भी करीब तीन लाख सीएफटी बालू होने का दावा किया गया, लेकिन वहां भी बालू नाम मात्र का ही मिला. प्रभात खबर की टीम ने इन जगहों की तस्वीरें और वीडियो भी रिकॉर्ड किए हैं, जो सरकारी दावों पर सीधे सवाल खड़े करते हैं.

बालू आया कहां से, यह भी बड़ा सवाल

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर जेएसएमडीसी के पास यह बालू आया कहां से? क्योंकि बालू घाटों पर निगम का अधिकार 15 अगस्त 2025 को ही समाप्त हो चुका है. यानी उसके बाद निगम किसी घाट से बालू का उठाव नहीं कर सकता था. ऐसे में अब अचानक लाखों सीएफटी बालू का स्टॉक दिखाना कई तरह की आशंकाओं को जन्म दे रहा है. बालू कारोबार से जुड़े लोगों का कहना है कि 10 जून से एनजीटी की रोक लागू हो जाती है, जिसके बाद बालू उठाव पर प्रतिबंध लग जाता है. ऐसे में आशंका जताई जा रही है कि नीलामी के नाम पर बड़े पैमाने पर चालान जेनरेट किए जा सकते हैं और बाद में उन्हीं चालानों के सहारे घाटों से अवैध बालू निकालकर मॉनसून के दौरान उसे वैध बताकर बेचा जा सकता है.

बारिश में बालू बह जाने की कही जा रही बात

हालांकि जेएसएमडीसी इन सभी आरोपों को खारिज कर रहा है. निगम के सैंड अधिकारी करुण चंदन का कहना है कि अगस्त 2025 तक जो बालू घाटों से उठाकर स्टॉकयार्ड में रखा गया था, उसी की अब नीलामी की जा रही है. उनका दावा है कि सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही टेंडर निकाला गया है और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से हो रही है, लेकिन जब उनसे पूछा गया कि जिन जगहों पर लाखों सीएफटी बालू दिखाया गया है वहां जमीन पर बालू क्यों नहीं मिल रहा, तो उनका जवाब था कि हो सकता है बारिश में कुछ बालू बह गया हो. अब यही बयान पूरे मामले को और संदिग्ध बना रहा है. क्योंकि सवाल उठ रहा है कि अगर लाखों सीएफटी बालू बारिश में बह गया, तो उसका रिकॉर्ड कहां है? उसकी रिपोर्ट किस विभाग को दी गई? और अगर बालू बह चुका था, तो फिर उसी स्टॉक की नीलामी क्यों की जा रही है?

अब नजरें सरकार की कार्रवाई पर

अब इस पूरे मामले ने झारखंड में बालू कारोबार और सरकारी सिस्टम दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. विपक्ष से लेकर बालू कारोबार से जुड़े लोग तक यह मांग उठा रहे हैं कि जिन स्टॉक यार्ड के नाम पर टेंडर निकाला गया है, वहां की स्वतंत्र जांच कराई जाए. क्योंकि अगर बिना स्टॉक के नीलामी हो रही है, तो यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि करोड़ों रुपये के संभावित घोटाले का संकेत भी हो सकता है. अब निगाहें 5 जून की नीलामी और सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं कि आखिर इस बालू खेल का सच सामने आता है या फिर पूरा मामला फाइलों में ही दबकर रह जाएगा.

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अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.

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