jharkhand mandi rate : कहीं किसान तो कहीं बिचौलियों के हाथों में है सब्जी का थोक कारोबार

Updated at : 27 Nov 2020 6:50 AM (IST)
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jharkhand mandi rate : कहीं किसान तो कहीं बिचौलियों के हाथों में है सब्जी का थोक कारोबार

jharkhand vegetable price/ vegetables price list today : झारखंड में शहर से लेकर गांव तक में सब्जियों की खुदरा कीमत एक जैसी हो गयी है.

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रांची : जब दूसरे राज्यों में सब्जियों की मांग घट जाती है, तब स्थानीय बाजार में सब्जियों की कीमत गिरने लगती है. इस वर्ष पिछले छह-सात माह से सब्जियों की कीमत चढ़ी हुई है. लॉकडाउन के दौरान गांव और शहर में सब्जियों की कीमत में कुछ अंतर था.

रांची और इसके आसपास के इलाके से सब्जियों का बड़ा कारोबार होता है. कई सब्जी मंडियां हैं, जहां से सब्जियां दूसरे राज्यों को भेजी जाती हैं. गुरुवार को बेड़ो बाजार से करीब एक दर्जन ट्रक सब्जी दूसरे राज्यों के लिए भेजी गयी. आसपास के गांव के किसान छोटी-छोटी गाड़ियों में लेकर बेड़ो मंडी आये थे. करीब तीन ट्रक फ्रेंचबीन कोलकाता और शेष ट्रक में आलू भुवनेश्वर, बिहार शरीफ भेजा गया. प्रेंचबीन 28 रुपये प्रति किलो की थोक कीमत पर बिका. वहीं, आलू 38 से 40 रुपये प्रति किलो की दर से बिका.

सस्ती सब्जी के लिए करना होगा इंतजार :

सस्ती सब्जी के लिए ग्राहकों को अभी इंतजार करना होगा. दूसरे राज्यों से कारोबार बढ़ने के कारण भी राजधानी में हरी सब्जियों की कीमत अब नहीं गिर रही है. पिछले कुछ महीनों से सब्जियों की कीमतें बढ़ी हुई हैं. राजधानी में हरी सब्जियों की खेती मुख्य रूप से ओरमांझी, पिठोरिया, बुढ़मू, मांडर, चान्हो, नगड़ी, इटकी और बेड़ो इलाके में होती है.

ओरमांझी, पिठोरिया, बुढ़मू, मांडर और चान्हो के किसानों के सब्जी बेचने का तरीका अलग है. नगड़ी, इटकी और बेड़ो के किसानों का तरीका अलग है. इस स्थानों से थोक में सब्जियां दूसरे राज्यों या राज्य के ही दूसरे जिलों में जाती हैं. ओरमांझी से चान्हो तक के किसान खुद थोक कारोबार करते हैं. इनका दूसरे राज्यों से व्यापारियों से सीधा संबंध है. किसान समूह बना कर भी बाजार जा रहे हैं.

इससे इनकी कमायी भी ज्यादा होती है. वहीं, इटकी, नगड़ी और बेड़ो के किसान अाज भी बिचौलियों के माध्यम से कारोबार कर रहे हैं. इस कारण यहां के किसानों को कम लाभ होता है.

उपजाने से ज्यादा बेचने में है विश्वास :

रांची वेटनरी कॉलेज के कैंपस में बुधवार और शनिवार को सब्जी बाजार लगता है. करीब 100 सब्जी बिक्रेता यहां बैठते हैं. इसमें से 70 फीसदी महिलाएं हैं. सभी आसपास के गांव की है. लेकिन, वह अपने खेत की एक या दो ही सब्जी बेचती हैं. बाकी सब्जी वह डेली मार्केट या लोकल बिचौलिया से लेती हैं. कहती हैं कि खेत में उपजी सब्जी बेचने से उतना फायदा नहीं होता है, जितना खरीद कर बेचने से. खरीदी गयी सब्जी बेचने से कीमत का अंतर पता चल पाता है. इस कारण खेत रहते हुए कई पारंपरिक किसान केवल सब्जी विक्रेता बन कर रह गये हैं.

गांव-शहर में सब्जी की कीमत में अंतर नहीं :

अब गांव और शहर की खुदरा मंडियों में सब्जियों की कीमतों में बहुत अंतर नहीं रह गया है. धुर्वा के शालीमार बाजार या लालपुर बाजार की खुदरा मंडी में सब्जियों की जो कीमतें हैं, वही कीमत मांडर चौक और पिठोरिया चौक के बाजार में भी है. हर किसान को पता है कि कौन सी सब्जी किस कीमत पर शहरों में बिक रही है. जबकि, शहर के बीच के कुछ बाजारों में सब्जियां ग्रामीण इलाकों से कम कीमत पर मिल जाती हैं.

सब्जी मोरहाबादी मांडर पिठोरिया

फूल गोभी 30 से 35 20 से 30 35 से 40

पत्ता गोभी 30 से 35 20 से 30 25 से 30

टमाटर 30 से 40 30 से 40 35 से 40

फ्रेंचबीन 20 से 30 30 से 40 20 से 25

मूली 10 से 12 10 से 12 पांच से 10

शिमला मिर्च 60 से 80 60 से 80 40 से 50

सब्जी मोरहाबादी मांडर पिठोरिया

सेम 30 से 40 50 से 60 30 से 35

पालक साग 20 से 25 20 से 30 05 से 10

बैंगन 25 से 30 20 से 25 25 से 30

मटर 80 से 100 60 से 70 50 से 60

भिंडी 40 से 45 30 से 40 40 से 45

कद्दू 20 से 30 20 से 25 20 से 25

तकनीक ने बढ़ायी बाजार की समझ

गुरुवार को बेड़ो के खत्री खटंगा निवासी गौतम कपूर ने 39 रुपये किलो आलू (ज्योति वेराइटी) थोक में बेचा. एक सप्ताह पहले उन्होंने 38 रुपये किलो बेचा था. किसान बुढ़मू के एक किसान इजरायल ने सड़क के किनारे स्थित अपने खेतों में आलू लगाया है. पूछने पर कहा कि वह खुद थोक व्यापारी से बात कर रहे हैं. किसी बिचौलियों को देने की जरूरत ही नहीं है.

पिठोरिया निवासी राजेश साहू ने बताया कि थोक व्यापारी खुद आकर खेत से सब्जी ले जाते हैं. अभी सब्जियों को बेचने के लिए बिचौलिया की जरूरत नहीं है. बड़े व्यापारी खुद खेत से सब्जियां ले जा रहे हैं. चान्हो और मांडर में किसानों के खेतों तक ही छोटी-छोटी गाड़ियां पहुंच रही हैं. किसान कहते हैं कि पांच-10 रुपये प्रति किलो कम कीमत मिलने पर भी नुकसान नहीं है, क्योंकि बाजार तक ले जाने का खर्च बहुत है.

posted by : sameer oraon

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