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गोस्सनर इवांजेलिकल लूथेरन के 177 साल हुए पूरे, रांची में ऐसे हुई थी इसकी शुरुआत

Updated at : 02 Nov 2022 9:03 AM (IST)
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गोस्सनर इवांजेलिकल लूथेरन के 177 साल हुए पूरे, रांची में ऐसे हुई थी इसकी शुरुआत

गोस्सनर इवांजेलिकल लूथेरन (जीइएल) कलीसिया, छोटानागपुर व असम की स्थापना के 177 साल दो नवंबर को पूरे हो रहे हैं. इस कलीसिया की स्थापना दो नवंबर 1845 को जर्मनी से आये लूथेरन मिशनरियों ने की थी.

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रांची: गोस्सनर इवांजेलिकल लूथेरन (जीइएल) कलीसिया, छोटानागपुर व असम की स्थापना के 177 साल दो नवंबर को पूरे हो रहे हैं. इस कलीसिया की स्थापना दो नवंबर 1845 को जर्मनी से आये लूथेरन मिशनरियों ने की थी. रेव्ह इमिल शत्स, रेव्ह फ्रेड्रिक बच, रेव्ह ऑगस्ट ब्रांट और रेव्ह थियोडोर यानके को गोस्सनर मिशन जर्मनी के संस्थापक फादर योहानेस इवांजेलिस्ता गोस्सनर ने 10 जुलाई 1844 को वहां के बेथलेहम गिरजाघर में प्रार्थना कर बर्मा के मेरगुई में सुसमाचार प्रचार के लिए रवाना किया था.

अपनी यात्रा के क्रम में जब मिशनरी कोलकाता पहुंचे, तो उन्हें पता चला कि बर्मा में अमेरिका के बैपटिस्ट मिशनरी पहले ही पहुंच चुके हैं. इसलिए वे कोलकाता में बाइबल सोसाइटी के परिसर में रुक गये. इस बीच उन्हें कोलकाता में काम करनेवाले छोटानागपुर के आदिवासी रेजा-कुलियों का हालात देखने का मौका मिला. उन दिनों रांची के कमिश्नर मेजर ऑस्ले और डिप्टी कमिश्नर कैप्टन जॉन कोलफील्ड हेनिंग्टन थे. वे चाहते थे कि इस इलाके में भी मसीही सुसमाचार का प्रचार किया जाये.

उनकी पहल पर चार मिशनरियों को छोटानागपुर भेजने का निर्णय लिया गया. चारों मिशनरी 25 फरवरी 1845 को कोलकाता से रवाना हुए. बांकुड़ा में रुक कर हिंदी सीखी और दो नवंबर 1845 को रांची पहुंचे. यहां मेजर ऑस्ले ने उनका स्वागत किया. उनकी पहल पर रातू महाराज से 121 एकड़ जमीन की बंदोबस्ती करायी गयी. मिशनरियों ने उक्त जमीन पर एक दिसंबर 1845 को अपना तंबू खड़ा किया और इसे ‘बेथेसदा’ नाम दिया. इसका अर्थ ‘दया का घर’ है. यह स्थान वर्तमान बेथेसदा बालिका उवि के परिसर में है.

क्राइस्ट चर्च का निर्माण :

मिशनरियों ने लोगों की मदद से मेन रोड स्थित क्राइस्ट चर्च का निर्माण किया. इसकी नींव 18 नवंबर 1851 को रखी गयी थी. फादर जोहानेस इवांजेलिस्ता गोस्सनर को जानकारी मिली कि कुछ स्थानीय लोगों ने मसीही धर्म स्वीकार किया है, पर इससे कहीं ज्यादा लोगों ने मसीही धर्म के प्रति उत्सुकता दिखायी है. तब उन्होंने रांची में एक बड़ा गिरजाघर बनाने का निर्देश दिया. इसमें आठ सौ लोगों के बैठने की व्यवस्था की गयी. इसका उद्घाटन 24 दिसंबर 1855 को हुआ था.

12 राज्यों में विस्तार :

इस कलीसिया का विस्तार देश के 12 राज्यों में किया गया. इसकी 1988 मंडलियां (चर्च) हैं. इस कलीसिया द्वारा गोस्सनर स्कूल, बेथेसदा स्कूल व गोस्सनर कॉलेज सहित कई शिक्षण संस्थान संचालित किये जा रहे हैं. इनमें 101 प्राइमरी स्कूल, नौ इंग्लिश मीडियम स्कूल, 54 मिडिल स्कूल, चार हायर सेकेंडरी स्कूल, 32 हाइस्कूल, एक प्राइमरी टीचर एजुकेशन कॉलेज, एक बीएड कॉलेज, एक एमएड कॉलेज व छह कॉलेज शामिल हैं. इसके अतिरिक्त दो डिस्पेंसरी भी हैं.

एक दिसंबर को पूरे होंगे ‘बेथेसदा’ के 170 साल :

छोटानागपुर के प्रथम बालिका स्कूल ‘बेथेसदा’ के 170 साल एक दिसंबर को पूरे हो जायेंगे. इसकी स्थापना जर्मनी मिशनरियों ने एक दिसंबर 1852 को रांची में की थी. तब यहां अंग्रेज सरकार द्वारा लड़कों के लिए 1939 में स्थापित किशुनपुर स्कूल (अब रांची जिला स्कूल) ही था.

रिपोर्ट- मनोज लकड़ा

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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