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Tuesday, March 5, 2024

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Exclusive: हेमंत सोरेन ने जो दीया जलाया है, उसे बुझने नहीं देंगे : मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन

मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद चंपाई सोरेन ने प्रभात खबर से बात की. बचपन से लेकर झारखंड आंदोलन तक का जिक्र किया. झारखंडी सोच की बात कही.

सुनील चौधरी, रांची

मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने कहा कि हेमंत ने जो दीया जलाया है, उसे बुझने नहीं देंगे. विकास के जो कार्य उन्होंने शुरू किये हैं, बस उसी को आगे बढ़ाना है. झारखंड के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है. सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखना है. मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद चंपाई सोरेन ने प्रभात खबर से बात की. बचपन से लेकर झारखंड आंदोलन तक का जिक्र किया. झारखंडी सोच की बात कही. उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि कुछ नया करने की जरूरत नहीं है. सारा खाका तैयार है. पढ़िये सीएम आवास में चंपाई सोरेन से हुई बातचीत के मुख्य अंश.

सवाल : विपरीत परिस्थिति में आप झारखंड के मुख्यमंत्री बने हैं. समय कम है. काम को कैसे आगे बढ़ायेंगे?

जवाब : परिस्थिति भले ही विपरीत रही है, पर हेमंत सोरेन ने जो लकीर खींच दी है, उनकी जो सोच है, इससे काम करना कोई मुश्किल नहीं होगा. उन्होंने जो सोचा था, जो योजना बनायी थी, उसी को आगे लेकर जाना है. आप देखें कि पूरे विश्व में कोरोना था. झारखंड में लोगों ने हेमंत को नेतृत्व देखा. रोजी-रोजगार से लेकर आवास तक की व्यवस्था की. हेमंत हमेशा सोचा करते हैं कि पूरी दुनिया के लिए झारखंड सोने की चिड़िया है. पर हम क्यों इसे ऐसा नहीं समझते? झारखंड क्यों पिछड़ा है? आदिवासी-मूलवासी की क्यों ऐसी स्थिति है? उन्होंने सोचा कि जब-तक यहां के आदिवासी-मूलवासी अच्छी शिक्षा नहीं पायेंगे, तब तक आगे नहीं बढ़ सकते. उन्होंने इसी दिशा में काम किया. मॉडल स्कूल बनाया, आदिवासी, दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक को विदेश में पढ़ाई करने में सहायता देना शुरू किया. वह कहते हैं कि आदिवासी-मूलवासी के दिल में वो दीया जला देंगे, जो कोई बुझा नहीं सकता. बस इसी दीये को आगे जलाये रखना है. इसे बुझने नहीं देंगे.

सवाल : हेमंत ने कई काम किये हैं, उसे आगे बढ़ाना आपके लिए भी चुनौती होगी, कैसे बढ़ायेंगे?

जवाब : यहां के लिए सबसे जरूरी है शिक्षा. इसके साथ-साथ आदिवासियों की सामाजिक व्यवस्था बनी रहे. एसटी, एससी-ओबीसी की सामाजिक व्यवस्था बनी रहे. उनके साथ कोई खिलवाड़ न करे. उनकी परंपरा, धार्मिक व्यवस्था सब बनी रहे. हेमंत जी की यही सोच है और इसी सोच पर काम भी करेंगे.

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सवाल : आपने एक दिन पहले ही मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. तुरंत ही बजट लाने की जवाबदेही आप पर आ गयी है, बजटा में क्या एजेंडा होगा और कैसे करेंगे?

जवाब : हेमंत बाबू झारखंड के विकास की दिशा बना चुके हैं. बजट का काम भी पूरा हो चुका है. मुझे नहीं लगता है कि उसमें कुछ आगे जोड़ा जा सकता है. झारखंड के आदिवासी-मूलवासी, दलित, किसान व जनता के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य पर फोकस बजट होगा. हेमंत ने अबुआ आवास योजना की संख्या बढ़ायी थी. 20 लाख किया. इसे बजट में पेश किया जायेगा. बजट झारखंड को अपने पैर पर खड़ा करने की सोचवाली होगी. बजट में हेमंत जी की सोच की पूरी झलक मिलेगी. आपकी योजना-आपकी सरकार-आपके द्वार काम को आगे बढ़ाया जायेगा. अफसरों को गांव तक जाना होगा. डीसी से लेकर बीडीओ तक सबको गांव जाना होगा. इस योजना में सभी जाति, सभी परिवार का काम होता है.

सवाल : दो विभागों खास कर खान व भूमि को लेकर विवाद हुआ, इसी को लेकर हेमंत पर आरोप लगाये गये हैं?

जवाब : झारखंड में खनन कार्य क्या 20 वर्षों में शुरू हुआ है? यह तो 150 वर्षों से चल रहा है. जिस पत्थर को उठा कर हम चिड़िया मारते हैं, उसी पत्थर को कंपनीवाले आयरन ओर बना देते हैं. हमलोगों ने कभी उस खनिज का इस्तेमाल नहीं किया. बल्कि उससे हम प्रभावित हुए. उल्टा प्रदूषण, विस्थापन और जल संकट हमलोग ही झेले. आदिवासियों की जमीन सूख गयी. जलस्तर नीचे चला गया. लाखों की आबादी विस्थापित हो गयी. खनन कार्य चार वर्ष से नहीं हो रहा है, सालों से हो रहा है. यदि भ्रष्टाचार हुआ, तो क्या चार साल में हुआ है, 23 वर्ष पहले से कोई भी सरकार तो रही होगी. गड़बड़ी तब क्यों नहीं दिखी. रांची, टाटा, धनबाद, बोकारो कहां से बस गये? कहां इतनी आबादी आ गयी, जबकि यह तो फिफ्थ शिड्यूल में था? तब कहां से लोगों ने जमीन ली? कैसे ली. हम तो चाहते हैं कि कोई एजेंसी जांचे और सब आदिवासी-मूलवासी-दलित की जमीन वापस करे. डैम बना, तो ईचागढ़ में 116 गांव डूब गये. कोयला कहां जा रहा है, क्या यहां के लोग उपयोग कर रहे हैं? यह तो हरियाली भरा प्रदेश था. रांची हरा-भरा था, तो 25 लाख की आबादी कहां से आ गयी. शिड्यूल एरिया में रहते आदिवासी की जमीन चली गयी. ये बातें वही लोग ज्यादा उठाते हैं, जिन्होंने खुद ही यहां के आदिवासी-मूलवासी की जमीन पर कब्जा किया है. बोलने पर खाता-बही दिखाने लगते हैं.

सवाल : तो हेमंत सोरेन पर कार्रवाई कैसे हुई?

जवाब : जब-जब हम झारखंड के इतिहास को याद करते हैं? तिलका-मांझी, सिदो-कान्हू-बिरसा मुंडा और यहां की अस्मिता, अस्तित्व के लिए कोई सही कदम उठाता है, उस समय ही यहां के नेतृत्व पर प्रहार होता है. यहां के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए हमारे युवा, कर्मठ, कर्मवीर हेमंत सोरेन ने काम शुरू किया, इसलिए विपक्ष ने हताश होकर यह कदम उठाया है. पर हेमंत ने जो काम कर दिया है, दीया को जलाया है, उस पर पानी डालने से वह बुझेगा नहीं, बल्कि हेमंत और मजबूत होकर निकलेगा.

सवाल : समय कम है. आगे का रोडमैप क्या होगा?

जवाब : अभी तो शुरु ही किया है? शपथ लिया. फिर पार्टी के स्थापना दिवस और गठबंधन के भारत जोड़ो न्याय यात्रा में शामिल हुए. हम झारखंड की भौगोलिक स्थिति को जानते हैं. बहुत बड़ा दायित्व मिला है. कम समय में हमारा प्रयास होगा झारखंड के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का. ग्रामीण और शहरी ढांचा को समानांतर करने की योजना है. इस पर काम कर रहे हैं.

सवाल : रोजगार एक बड़ा मुद्दा है? परीक्षा होती नहीं कि रद्द हो जाती है?

जवाब : मैने कहा न कि बुनियादी ढांचे को मजबूत करना है. इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सब जुड़ा है. सब काम होगा. रोजगार भी मिलेगा.

सवाल : 1932 खतियान, सरना धर्म कोड और ओबीसी आरक्षण का सवाल आज भी मौजूं है, कैसे होगा?

जवाब : सब होगा. केंद्र सरकार ने यही तो देख कर नेतृत्व पर हमला किया, साजिश की, ताकि ये काम न हो सके. पर हेमंत ने जो काम किया, राज्य के लिए किया है, वह विपक्ष के लोग आनेवाले 100 वर्षों में भी नहीं कर पायेंगे. जो लकीर खींची है, उससे बड़ी लकीर विपक्ष के लोग मर जायेंगे पर नहीं होगा.

सवाल : मंत्रिमंडल विस्तार कब तक होगा?

जवाब : सब हो जायेगा, आप देखते रहें. फ्लोर टेस्ट भी हो जायेगा.

सवाल : झारखंड आंदोलन से कैसे जुड़े और शिबू सोरेन के संपर्क में कैसे आये?

जवाब : मैं गांव में मैट्रिक पढ़ा हुआ था. इसी दौरान पंडित रघुनाथ मुर्मू के ओल-चिकी लिपी के प्रचार-प्रसार से जुड़ गया. उस समय झारखंड आंदोलन की बात सुनता था. इसी दौरान करीब 1977-78 में झारग्राम में ऑल इंडिया संताल एसोसिएशन का एक महाधिवेशन हुआ. जिसमें बिहार, ओड़िशा, असम, बंगाल से एक लाख लोग आये थे. मैं वोलेंटियर बन कर वहां गया था. तीन दिवसीय इस सम्मेलन के तीसरे दिन के मुख्य अतिथि दिशोम गुरु शिबू सोरेन थे. करीब 12-एक बजे वह अधिवेशन में आये, तो सारा आदमी बोलने लगा कि दिशोम गुरु आ गया. मैं भी उत्सुकतावश गया. वोलेंटियर था, तो उनका चेहरा और उनकी बात सुनने के लिए उतावला था. पंडित रघुनाथ मुर्मू ने भी कहा कि यही वो आदमी है, जो आदिवासियों को उनकी मंजिल तक ले जायेगा. उस समय चर्चा हुई कि ओल-चिकी लिपि के लिए यूनिवर्सिटी बनानी होगी. गुरुजी ने कहा कि अभी एक लाख लोग हैं. अगले वर्ष दो लाख लोग आयें. सब अपने हाथों में दो-दो ईंट और बालू-सीमेंट लेकर आयें, यूनिवर्सिटी बन जायेगी. गुरुजी के बड़े भाई राजाराम सोरेन की बेटी का ब्याह मेरे ही गांव के करीब हुआ था. गुरुजी दामाद के घर जाना चाहते थे. वह गये. गरमी का मौसम था. तो वह दामाद के घर के बाहर ही सो गये. कहा कि दामाद के घर में नहीं जा सकते. तब हमलोग 150 युवा उनकी सुरक्षा में तैनात थे. पर रात भर वह जगे रहे और हमें आंदोलन की बात बताते रहे. उसी समय मैं गुरुजी का भक्त बन गया.

सवाल : सक्रिय रूप से आंदोलन में कैसे आये?

जवाब : मैं टाटा, यूसिल व मुसाबनी के मजदूरों की आवाज उठाने लगा. बड़ी संख्या में मजदूर मेरे साथ होते थे. गुरुजी ने कहा था कि नशाबंदी व हब्बा-डब्बा के खिलाफ आंदोलन करो. मैने यह शुरू कर दिया. गांव व अपने रिश्तेदारों की भट्ठियां भी तोड़ दीं. जिसके कारण मेरे माता-पिता भी नाराज हो गये थे. पर जब मैं बीमार पड़ा और मजदूर मेरे घर साइकिल से आते. कोई एक फल, तो कोई दो फल लेकर आता. देखते ही देखते घर फलों से भर गया. तब मेरे माता-पिता को समझ में आया कि आखिर इतना लोग इसे कैसे मानते हैं. फिर उन्होंने मेरा कभी विरोध नहीं किया. पहले यूसिल में यह प्रावधान था कि तीन एकड़ जमीन देने पर ही नौकरी मिलेगी. मैने विरोध किया, तो प्रबंधन ने कहा कि एक बित्ता जमीन देने वाले को भी नौकरी मिलेगी. मुझे मारने तक धमकी दी गयी थी. पर आंदोलन कभी रुका नहीं. इसी तरह झारखंड आंदोलन से भी जुड़ गया. मेरा लंबा संघर्ष रहा.

सवाल : अभी आप झारखंड के मुख्यमंत्री हैं. पर साथ ही झामुमो के उपाध्यक्ष भी हैं. सरकार भी चलानी है और गंठबंधन को भी लेकर चलना है. विपक्ष हमलावर है. लोकसभा चुनाव भी सामने है. इन परिस्थितियों से आप कैसे निबटेंगे ?

जवाब : झारखंड आंदोलन के दौरान मैं, शिबू सोरेन और शैलेंद्र भट्टाचार्य कहीं जा रहे थे. मैने गुरुजी से कहा कि थोड़ा बुद्धि दे दीजिये कि मजदूरों के आंदोलन के लिए क्या करना होगा, तब उन्होंने मुझे डांटा था कि बड़ी कंपनियों के प्रबंधन की ताकत जाननी होगी. तुम जहां हो, वहां की परिस्थिति के अनुरूप काम करो. झारखंड आंदोलन और मजदूरों के आंदोलन में अंतर है. संघर्ष करना होगा, नहीं तो मौत हो जायेगी. आपको आकलन करना है कि कैसे आगे जाना है. संघर्ष करोगे, तो कोई आपको आराम से चलने नहीं देगा. सावधानी की जरूरत होगी. विरोधी की हर चाल को समझना होगा. किसी को कमजोर न समझें. अभी की लड़ाई में भी विरोधी की हर चाल को समझते हैं. किस चाल को कैसे नाकाम करना है, यह हमें अब आता है. मैं किसी विरोधी को कमजोर नहीं समझता. आपकी सोच और विचार का सटीक होना जरूरी है. राजनीति किसी किताब में नहीं लिखी होती. परिस्थिति का आकलन करना, समझना और कदम बढ़ाना होता है. हर चीज में संघर्ष करना है. बस इसी मंत्र के साथ आगे बढ़ेंगे. विपक्षी भी नाकाम होंगे.

सवाल : बाढ़ से फसल बर्बाद हुई, घर में अनाज नहीं रहा, तब पढ़ाई छोड़ हल पकड़ लिया

जवाब : मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने बातचीत के क्रम में अपने बचपन को भी याद किया. अपनी यादों के झरोखे से झांकते हुए बताया : मैं एक किसान परिवार से आता हूं. मेरी प्रारंभिक पढ़ाई गांव के समीप के डुडरा स्कूल बांग्ला मीडियम में हुई थी. प्राइमरी शिक्षा पूरी हुई, तो आसपास में कोई मीडिल स्कूल नहीं था. मीडिल स्कूल पोटका प्रखंड में था. जो मेरे घर से 30 किमी दूर था. स्कूल से छह-सात किमी दूर मेरी मौसी का घर था. फिर मैं मौसी के घर चला गया. पर छह-सात किमी पैदल ही स्कूल जाता था. फिर हाइस्कूल पढ़ने के लिए बिष्टुपुर गया. मैट्रिक पास किया ही था कि गांव में बाढ़ आ गयी. 1974 में खरकई व स्वर्णरेखा नदी में आयी. बाढ़ की वजह से खेत की फसल बर्बाद हो गयी. मेरे घर में खाने की कमी नहीं थी. पर बाढ़ की वजह से सब बर्बाद हो गया. हमारे यहां काम करने वाले को अनाज दे दिया गया, पर हमारे घर में ही अनाज खत्म हो गया. खाने तक की दिक्कत होने लगी. मैं तीन भाइयों में सबसे बड़ा था. तब पिताजी ने कहा कि खेतों में हल चलाना होगा. मैने पढ़ाई के दौरान कभी हल नहीं चलाया था. पर परेशानी देखते हुए पढ़ाई छोड़ कर मैने हाथों में हल थाम लिया. गेहूं, दाल की खेती आरंभ की. फिर पढ़ाई के लिए समय ही नहीं मिला.

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