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कुपोषण की वजह से झारखंड में बढ़ रहे दृष्टिहीनता के मामले, 2030 में डायबिटिक कैपिटल होगा हिंदुस्तान

कुपोषण की वजह से झारखंड में दृष्टिहीनता के मामले बढ़ रहे हैं. विश्व में 3.7 करोड़ दृष्टिहीन लोग हैं, जिसमें 4.8 फीसदी भारतीय हैं.

विश्व में 3.7 करोड़ लोग दृष्टिहीन हैं. इनमें 4.8 फीसदी लोग डायबिटीज की वजह से दृष्टिहीन हुए हैं. कॉर्नियाजनित दृष्टिहीन लोगों की संख्या भारत में 12 लाख है. चिंता की बात यह है कि हर साल इसमें 25,000 से 30,000 नये मरीज जुड़ रहे हैं. यह कहना है रिम्स के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ राहुल प्रसाद का.

डिजिटल एरा में बढ़ रहा है स्क्रीन टाइम

डॉ राहुल प्रसाद कहते हैं कि डिजिटल एरा में स्क्रीन टाइम ज्यादा हो रहा है. इसकी वजह से कम आयु में ही आंखों की समस्या होने लगी है. कोरोना के बाद स्क्रीन टाइम बढ़ा है, जिसकी वजह से बड़ी संख्या में बच्चों को चश्मा पहनना पड़ रहा है. हालांकि, खुद को अनुशासन में रखकर आंखों के विकार से खुद को बचा सकते हैं.

10-15 साल में हुए हैं कई क्रांतिकारी परिवर्तन

डॉ प्रसाद का कहना है कि 10-15 साल में कई बड़े परिवर्तन हुए हैं. हमारे खान-पान में, वातावरण में और हमारी कार्यप्रणाली में क्रांतिकारी बदलाव आए हैं, जिसकी वजह से आंखों बीमारी बढ़ी है. डायबिटीज से पीड़ित 4.8 फीसदी लोग अंधेपन के शिकार हो रहे हैं.

2030 में विश्व के 40 फीसदी डायबिटीज रोगी होंगे भारत में

डॉ राहुल आगे कहते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने कहा है कि 2030 तक भारत डायबिटिक कैपिटल बन जाएगा. 40 फीसदी लोग डायबिटीज से पीड़ित होंगे. इनमें से 20 फीसदी को गंभीर डायबिटीज होगी, जिसकी वजह से आंखों के रोगी बढ़ेंगे.

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डायबिटीज का क्या है आंखों पर प्रभाव?

डॉ राहुल प्रसाद कहते हैं कि शुगर का लेवल बढ़ता है और ज्यादा दिनों तक यह शरीर में रहता है, तो आंखों में खून की नसों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है. उन्होंने कहा कि इससे या तो आंखों से खून का रिसाव होने लगता है या नसों में खून की सप्लाई बंद हो जाती है. दोनों ही स्थिति में आंखों को नुकसान होता है.

छोटे बच्चों को क्यों पहनना पड़ रहा चश्मा?

एक सवाल के जवाब में डॉ राहुल प्रसाद ने कहा कि कोरोना के बाद हमारा स्क्रीन टाइम बढ़ा है. बच्चों की बाहर खेलने की प्रवृत्ति घटी है. इससे मायोपिया का असर आंखों पर आने लगा है. इसलिए छोटे बच्चों को भी चश्मा पहनना पड़ रहा है.

मोबाइल, लैपटॉप के जमाने में कैसे बचें स्क्रीन से?

मोबाइल और लैपटॉप से दूरी बनाना संभव नहीं है, ऐसे में स्क्रीन से कैसे बचें? इस सवाल के जवाब में डॉ राहुल ने कहा कि छोटे बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को लिमिट करें. बच्चों को आउटडोर एक्टिविटीज के लिए प्रेरित करें. इससे कम्प्यूटर के दुष्प्रभाव को कम कर सकते हैं. अगर आप कम्प्यूटर वर्कर हैं, तो उनके लिए यही कहेंगे कि 20 मिनट तक काम करने के बाद 20 सेकेंड का रेस्ट लें. दूर तक देखें. इससे आंखों की ड्राइनेस को कम करने में मदद मिलेगी.

कॉर्निया दृष्टिहीनता के कारण और निवारण

डॉ राहुल ने बताया कि कॉर्निया ट्रांसपेरेंट स्ट्रक्चर है. चोट या बीमारी की वजह से उसमें दाग आ जाते हैं. दाग ज्यादा हो जाने पर कॉर्निया की ट्रांसपेरेंसी हम खो देते हैं. उन्होंने कहा कि विटामिन ई की कमी, पोषण की कमी और आजकल इन्फेक्शन की वजह से भी कॉर्निया पर ज्यादा असर हो रहा है. इसलिए विटामिन ई, एंटी ऑक्सिडेंट्स और फलों का सेवन करें. मोबाइल और लैपटॉप का सीमित इस्तेमाल करें.

जन्मजात आंखों की समस्या का कैसे पता लगाएं?

डॉ राहुल ने बताया कि छोटा बच्चा अगर अपनी मां की आवाज को फॉलो नहीं करता है या उसकी आंखों का रंग अलग दिखता है. जैसे उसमें सफेदी दिख रही हो, तो उसे तुरंत नेत्र चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. रिम्स के डॉ राहुल प्रसाद कहते हैं कि कॉर्निया डोनेशन के बारे में देश और झारखंड में जागरूकता बहुत कम है. झारखंड में कुपोषण की वजह से बहुत से लोग आंखों की बीमारी ग्रसित हो जाते हैं.

कॉर्निया डोनेशन की प्रक्रिया क्या है?

  • निकटतम आई बैंक से संपर्क करें.
  • नेत्रदान का फॉर्म भरें.
  • व्यक्ति की मृत्यु के बाद आई बैंक को संपर्क करें और उन्हें सूचना दें.
  • मृत व्यक्ति को पंखे के नीचे या एसी में नहीं रखें.
  • नेत्रदान कर चुके व्यक्ति की आंखों पर गीली रुई रख दें, ताकि कॉर्निया सुरक्षित रहे.
  • आई बैंक की टीम 2-3 घंटे के भीतर आकर कॉर्निया निकालकर ले जाए, तो उस कॉर्निया से दूसरे व्यक्ति को रोशनी मिल सकती है.
Mithilesh Jha
Mithilesh Jha
मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवरेज करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है। मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है

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