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Azadi Ka Amrit Mahotsav: नान्दु साहू टाना भगत ने साथियों संग मांडर थाने पर किया था कब्जा

Updated at : 02 Aug 2022 12:00 PM (IST)
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Azadi Ka Amrit Mahotsav: नान्दु साहू टाना भगत ने साथियों संग मांडर थाने पर किया था कब्जा

हम आजादी का अमृत उत्सव मना रहे हैं.भारत की आजादी के लिए अपने प्राण और जीवन की आहूति देने वाले वीर योद्धाओं को याद कर रहे हैं.आजादी के ऐसे भी दीवाने थे,जिन्हें देश-दुनिया बहुत नहीं जानती वह गुमनाम रहे और आजादी के जुनून के लिए सारा जीवन खपा दिया़.झारखंड की माटी ऐसे आजादी के सिपाहियों की गवाह रही है.

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1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ. नान्दु साहू टाना भगत सर्वसम्मति से बुढ़मू प्रखंड के थाना मंत्री बनाये गये. इनका साथ सिदरौल के चरवा टाना भगत, रुपवा टाना भगत, खुटेट के मंगरा टाना भगत, सोसइ के शनिचरवा टाना भगत, तुरमूली के एतवा टाना भगत,लछु के टाना भगत और उमेंडा के बुधुवा टाना भगत आदि ने दिया. आंदोलन को देखते हुए टाना भगतों के सोनचिपी आश्रम में अंग्रेजों ने तालाबंदी कर दी थी. वहीं दूसरी ओर नान्दु साहू व उनके साथियों ने मांडर थाना, पोस्ट ऑफिस पर कब्जा कर काम बाधित कर दिया. आंदोलन को दबाने के लिए अंग्रेजों ने नान्दु टाना भगत, चांदो टाना भगत व सहयोगियों को पकड़ कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया था. इन्हें तीन साल की सजा मिली.

नान्दु और चांदो भाई थे: नान्दु साहू टाना भगत का जन्म 25 जून 1907 को रांची के बुढ़मू प्रखंड के मक्का गांव में हुआ था. ये दो भाई थे. बड़े भाई नान्दु और छोटे भाई चांदो साहू टाना भगत थे. चांदो साहू का जन्म 10 सितंबर 1909 को हुआ था. आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण दोनों पढ़ाई नहीं कर पाये. आठ वर्ष की उम्र में आठ आना फीस देकर मात्र एक माह ही अक्षर ज्ञान ले पाये. दोनों 15 वर्ष की आयु से ही अंग्रेजी हुकूमत, शासन और शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करने लगे.

टाना धर्म को अपनाया: उधर, महात्मा गांधी से प्रभावित होकर दोनों भाइयों ने टाना धर्म को अपना लिया. पैदल ही गांव-गांव जाकर लोगों को जागरूक करने लगे. फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन में कूद पड़े और जेल गये.

आजादी के बाद भी बना रहा सेवा भाव: देश जब आजाद हुआ, तब भी देश और समाज सेवा में अपना योगदान देते रहे. मक्का के पहले मुखिया चुने गये. इन्होंने भूमि दान कर हाई स्कूल बनवाया. इनके उत्कृष्ट कार्यों को देखते हुए 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इन्हें ताम्र पत्र और आजीवन स्वतंत्रता सेनानी पेंशन की मंजूरी दी.

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