Azadi Ka Amrit Mahotsav: ब्रह्म समाज से जुड़कर अन्याय के खिलाफ भूपेंद्रनाथ दत्त ने उठायी थी आवाज

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 08 Aug 2022 6:00 PM

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हम आजादी का अमृत उत्सव मना रहे हैं. भारत की आजादी के लिए अपने प्राण और जीवन की आहूति देनेवाले वीर योद्धाओं को याद कर रहे हैं. आजादी के ऐसे भी दीवाने थे, जिन्हें देश-दुनिया बहुत नहीं जानती वह गुमनाम रहे और आजादी के जुनून के लिए सारा जीवन खपा दिया झारखंड की माटी ऐसे आजादी के सिपाहियों की गवाह रही है.

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Azadi Ka Amrit Mahotsav: क्रांतिकारी भूपेंद्रनाथ दत्त का जन्म 4 सितंबर, 1880 को कलकत्ता में हुआ था. उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त और माता का नाम भुवनेश्वरी था. वे महान चिंतक व दार्शनिक स्वामी विवेकानंद उनके बड़े भाई थे. उनके पिता कलकत्ता उच्च न्यायालय में जाने-माने वकील थे. भूपेंद्र की शुरुआती पढ़ाई ईश्वर चंद्र विद्यासागर के मेट्रोपॉलिटन इंस्टीट्यूशन में हुई. पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने सियासी सरगर्मियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया. युवावस्था में ही वे केशव चंद्र सेन और देबेंद्रनाथ टैगोर के नेतृत्व में ब्रह्म समाज में शामिल हो गये. यहां वे शिवनाथ शास्त्री से मिले, जिन्होंने उन्हें काफी प्रभावित किया.

भूपेंद्रनाथ के धार्मिक सोच को ब्रह्म समाज ने दिया नया रूप

भूपेंद्रनाथ दत्त के धार्मिक और सामाजिक सोच को ब्रह्म समाज ने एक नया रूप दिया. उन्होंने व्याप्त जात-पात, छुआछूत, ऊंच-नीच और महिलाओं के साथ होने वाले भेदभावों के खिलाफ आवाज उठायी. इसी दौरान हो रहे अंग्रेजों के ज़ुल्म ने उन्हें और इंकलाबी बनाना शुरू दिया. इसके बाद उन्होंने आजादी की लड़ाई में शामिल होने का फैसला किया और वर्ष 1902 में प्रमथनाथ मित्र द्वारा गठित ‘बंगाल रिवोल्यूशनरी सोसायटी’ में शामिल हो गये, जिसे अनुशीलन समिति के नाम से भी जाना जाता था. वर्ष 1906 में वे ‘युगांतर पत्रिका’ के संपादक बन गये. यह अखबार बंगाल की क्रांतिकारी संगठन ‘युगांतर’ का मुखपत्र था. इसके चलते भूपेंद्रनाथ दत्त श्री अरबिंदो और बरिंद्र घोष के काफी करीबी सहयोगी बन गये.

देशद्रोह के आरोप में जाना पड़ा जेल

भूपेंद्रनाथ दत्त को उनके उग्र लेखों की वजह से ब्रिटिश पुलिस ने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाकर वर्ष 1907 में गिरफ्तार कर लिया. उन्हें एक साल की सजा हुई. वर्ष 1908 में उन्हें रिहा कर दिया गया. जेल से छूटने के बाद अंग्रेजों ने भूपेंद्र को फिर से ‘अलीपुर बम कांड’ में फंसाने की कोशिश की, लेकिन वे उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चले गये. इस दौरान वे कुछ समय के लिए ‘इंडिया हाउस’ में रहे. उन्होंने अमेरिका की ब्राउन यूनिवर्सिटी से आर्ट्स में मास्टर्स डिग्री हासिल की. इस दौरान वे कैलिफोर्निया में ‘गदर पार्टी’ से जुड़ गये. यहां पर उन्होंने समाजवाद और साम्यवाद के बारे में गहरायी से अध्ययन किया.

बर्लिन में रहने के दौरान भी क्रांतिकारी गतिविधियों में लेते रहे हिस्सा

भूपेंद्रनाथ दत्त प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी चले गये. वर्ष 1916 में वे बर्लिन में भारतीय स्वतंत्रता समिति के सचिव बने और करीब दो वर्षों तक इस पद पर रहे. वर्ष 1920 में उन्होंने जर्मन मानव विज्ञान सोसायटी और 1924 में जर्मन एशियाटिक सोसायटी की सदस्यता ली. वर्ष 1921 में दत्ता कोमिन्टर्न में शामिल होने के लिए मास्को गये. उनके साथ मनबेंद्र नाथ रॉय और बीरेंद्रनाथ दास गुप्ता ने भी कोमिन्टर्न में हिस्सा लिया. इस दौरान भूपेंद्रनाथ ने व्लादिमीर लेनिन के समक्ष भारत के सियासी हालात पर एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया. उन्होंने वर्ष 1923 में जर्मनी के हैम्बर्ग विश्वविद्यालय से मानवशास्त्र में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. इसके बाद वे भारत लौट आये और कांग्रेस में शामिल होने का निश्चय किया.

ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के बने थे सदस्य

वर्ष 1927 में वे बंगाल कांग्रेस के हिस्सा बने और वर्ष 1929 में ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के सदस्य बने. भूपेंद्रनाथ दत्त ने वर्ष 1931 में कराची में हुए कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में किसानों, मजदूरों के हित संबंधी प्रस्ताव को मंजूर कराने में अहम भूमिका निभायी. उन्होंने दो अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलनों की अध्यक्षता भी की. बाद में राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता के चलते अंग्रेज पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. 26 दिसंबर, 1961 को भारत मां के महान सपूत का निधन हो गया.

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