रांची : नागपुरी सदान व कई जनजातियों की भी मातृभाषा

Updated at : 16 Sep 2019 9:11 AM (IST)
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रांची : नागपुरी सदान व कई जनजातियों की भी मातृभाषा

राजधानी में साहित्य अकादमी के सादरी भाषा सम्मेलन का समापन रांची : साहित्य अकादमी द्वारा झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के सहयोग से राजाधानी में आयोजित दो दिवसीय प्रथम सादरी (नागपुरी) भाषा सम्मेलन का समापन रविवार को प्रेस क्लब सभागार में हुआ़ इस अवसर पर साहित्यकार शकुंतला मिश्र ने नागपुरी साहित्य के विविध आयामों की […]

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राजधानी में साहित्य अकादमी के सादरी भाषा सम्मेलन का समापन
रांची : साहित्य अकादमी द्वारा झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा के सहयोग से राजाधानी में आयोजित दो दिवसीय प्रथम सादरी (नागपुरी) भाषा सम्मेलन का समापन रविवार को प्रेस क्लब सभागार में हुआ़ इस अवसर पर साहित्यकार शकुंतला मिश्र ने नागपुरी साहित्य के विविध आयामों की चर्चा की़ उन्होंने कहा कि नागपुरी झारखंड के सदान और कई जनजातियों की भी मातृभाषा है़ नागपुरी शिष्ट गीतों के प्रथम कवि नागवंश के 50वें राजा रघुनाथ नृपति थे, जिनका रचना काल 1626 के आसपास है़
तब से लगातार नागपुरी साहित्य की अजस्र धारा प्रवाहित होती रही है़ वहीं, नागपुरी गद्य साहित्य का प्रारंभ 1896 के आसपास माना जाता है़ उस साल रेव्ह ईएच व्हिटली ने पहला नागपुरी व्याकरण ‘नोट्स ऑन द गंवारी डायलेक्ट ऑफ लोहरदगा छोटानागपुर’ प्रकाशित किया था़ उन्होंने कहा कि आधुनिक नागपुरी कहानी प्रकाशन की शुरुआत अप्रैल 1961 में नागपुरी भाषा परिषद द्वारा प्रकाशित ‘नागपुरी’ पत्रिका के साथ हुई़ प्रफुल्ल कुमार राय को आधुनिक नागपुरी कहानियों का जनक माना जाता है़ 1957 में आकाशवाणी रांची की स्थापना के बाद सबसे पहले नागपुरी में ही नाटक व कहानियां प्रसारित की जाने लगी़ं
गीतों की भाषा है सादरी या नागपुरी: धनेंद्र ‘प्रवाही’ ने सादरी गीतों की परंपरा और उनका सौंदर्य विषय पर अपनी बात रखी़ कहा कि सादरी या नागपुरी गीतों की भाषा है़ डॉ कृष्ण ‘कलाधर’ ने कहा कि नागपुरी नाम से ही वर्ष 1980 में इस भाषा की पढ़ायी शुरू हुई़ रविवार को डॉ कुमारी वासंती, विमल कुमार टोप्पो, अंजू साहू, आलम आरा, विमला टोप्पो, मधु मंसूरी हंसमुख, अशोक बड़ाईक व आजाद अंसार ने अपने लेख पढ़े़
संचालन अंजू टोप्पो व सलोमी एक्का ने किया, वहीं डॉ कुमारी वासंती, धनेंद्र ‘प्रवाही’ व क्षितिज राय ने इनकी अध्यक्षता की़ आयोजन में झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा की महासचिव वंदना टेटे, एके पंकज व अन्य ने अहम योगदान दिया़
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