रांची : सीजेरियन प्रसव करानेवाली महिलाओं में अस्थमा का खतरा ज्यादा
Updated at : 26 Aug 2019 9:49 AM (IST)
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चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन द्वारा दमा और सांस की बीमारियों पर हुआ सेमिनार, विशेषज्ञ डॉ शास्त्री ने कहा रांची : पुणे से आयी डॉ नीरजा शास्त्री ने कहा कि भारत की आधी से अधिक आबादी सांस संबंधी रोग व फेफड़ा की समस्या से पीड़ित है, लेकिन समय पर पहचान व इलाज होने से इस समस्या से […]
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चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन द्वारा दमा और सांस की बीमारियों पर हुआ सेमिनार, विशेषज्ञ डॉ शास्त्री ने कहा
रांची : पुणे से आयी डॉ नीरजा शास्त्री ने कहा कि भारत की आधी से अधिक आबादी सांस संबंधी रोग व फेफड़ा की समस्या से पीड़ित है, लेकिन समय पर पहचान व इलाज होने से इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. महिलाओं में अस्थमा का कारण सीजेरियन भी है. सामान्य प्रसव की अपेक्षा सीजेरियन प्रसव करानेवाली महिलाओं में अस्थमा का खतरा कई गुणा बढ़ जाता है.
डॉ शास्त्री रविवार को चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन द्वारा ऑब्सट्रक्टिव एयरवे डिजीज पर होटल बीएनआर चाणक्या में आयोजित सेमिनार में बोल रही थीं. उन्होंने बताया कि क्रॉनिक ऑब्सट्रेक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) का 80 फीसदी कारण लकड़ी के चूल्हे का धुआं है.
लकड़ी व फसल के अवशेष जिसका उपयोग जलावन के रूप में किया जाता है उससे निकला धुआं सीओपीडी का सबसे बड़ा कारण है. छाती रोग विशेषज्ञ डॉ श्यामल सरकार ने बताया कि अस्थमा व सीओपीडी का लक्षण व इलाज अलग-अलग है. अस्थमा संक्रमण की बीमारी है, जो बचपन से हो सकती है. वहीं, सीओपीडी का कारण धुआं है, जो 40 साल की उम्र के बाद होता है. आॅर्किड के छाती रोग विशेषज्ञ डॉ निशीथ कुमार ने बताया कि इनहेलर का उपयोग अस्थमा व सीओपीडी में किया जाता है.
इनहेलर सबसे सुरक्षित दवा है, जिसका शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है. केवल सिगरेट या बीड़ी पीना ही नहीं, बल्कि लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाना व आग तापना भी खतरनाक होता है. सेमिनार में इनहेलर के सही उपयोग के लिए डॉक्टरों को हैंड्सऑन ट्रेनिंग दी गयी. कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न जिलों से आये करीब 75 डॉक्टर व रिम्स के जूनियर डॉक्टर शामिल थे.
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