चालीसा का पुण्यकाल- 34 : माता-पिता के त्याग को समझें
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :09 Apr 2019 12:42 AM (IST)
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उस दिन मैं बड़े गुस्से में घर से निकला. निर्णय कर लिया कि अब घर नहीं लौटूंगा. मोटर साइकिल मांगा तो पिताजी ने कुछ कहा नहीं, बस अपनी स्कूटर साफ करने लगे. जल्दबाजी में अपने पिता के ही जूते पहन कर निकल गया. जब मोटर साइकिल नहीं दिला सकते, तो मुझे इंजीनियर बनाने का सपना […]
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उस दिन मैं बड़े गुस्से में घर से निकला. निर्णय कर लिया कि अब घर नहीं लौटूंगा. मोटर साइकिल मांगा तो पिताजी ने कुछ कहा नहीं, बस अपनी स्कूटर साफ करने लगे. जल्दबाजी में अपने पिता के ही जूते पहन कर निकल गया. जब मोटर साइकिल नहीं दिला सकते, तो मुझे इंजीनियर बनाने का सपना क्यों देखते हैं? मैं पिताजी का पर्स भी उठा लाया था, जिसे वे कभी किसी को हाथ नहीं लगाने तक देते थे.
जैसे ही मैं कच्चे रास्ते पर आया, लगा कि जूते में कुछ चुभ रहा है. जूता निकाल कर देखा तो उसकी कोई कील निकल आयी थी. कुछ दूर चला, तो पैरों में कुछ गीला महसूस हुआ. सड़क पर पानी बिखरा था और जूता का तला टूटा हुआ था.
बस स्टैंड पहुंचने पर पर्स की तलाशी लेने की सोची. पर्स खोला, तो एक पर्ची दिखाई दी. लिखा था- लैपटॉप के लिए बैंक से 40 हजार रुपये उधार लिया है. पर, लैपटॉप तो घर में मेरे पास थी. दूसरी पर्ची- पुराना स्कूटर दीजिए, एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल लीजिए. पढ़ते ही दिमाग घूम गया.
कहीं पिजाजी तो… मैं घर की ओर भागा. वे घर पर नहीं थे. स्कूटर भी नहीं था. मैं दौड़ा, और एजेंसी पहुंचा. पिताजी वहीं थे और कुछ कागजात पर हस्ताक्षर करने वाले थे. मैंने उनको गले लग कर रोने लगा.
रोते हुए बोला- मुझे नयी मोटर साइकिल नहीं चाहिए. बस आप नये जूते ले लो. अब मैं अब खूब पढूंगा. अपने पैसे से मोटर साइकिल खरीदूंगा. मां एक ऐसी बैंक है, जहां आप हर भावना और दुख जमा कर सकते हैं. वहीं, पिता एक ऐसी क्रेडिट कार्ड, जिसमें बैलेंस न हो तब भी वे हमारी मांग पूरी करने की कोशिश करते हैं. इस बार ईस्टर में माता-पिता से कोई गिफ्ट न लें, उन्हें एक गिफ्ट दें, अच्छी संतान बनकर.
– फादर अशोक कुजूर, डॉन बॉस्को यूथ एंड एजुकेशनल सर्विसेज बरियातू के निदेशक
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