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jharkhand@18: इस कड़ी में पढ़ें, कैसे लड़ी टाना भगत ने लगान माफ करने की लड़ाई

Updated at : 04 Dec 2018 12:38 PM (IST)
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jharkhand@18:  इस कड़ी में पढ़ें, कैसे लड़ी टाना भगत ने लगान माफ करने की लड़ाई

झारखंड स्थापना के 18 साल पूरे हो गये. हम युवा झारखंड की कुछ कहानियां लेकर आपके सामने आये हैं. इनके सफर से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे झारखंड के युवा अलग-अलग क्षेत्रों में अपने लिए स्थान बना रहे हैं.झारखंड स्थापना दिवस पर शुरू हुई सीरीज की यह 14वीं कड़ी है. इस कड़ी में […]

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झारखंड स्थापना के 18 साल पूरे हो गये. हम युवा झारखंड की कुछ कहानियां लेकर आपके सामने आये हैं. इनके सफर से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कैसे झारखंड के युवा अलग-अलग क्षेत्रों में अपने लिए स्थान बना रहे हैं.झारखंड स्थापना दिवस पर शुरू हुई सीरीज की यह 14वीं कड़ी है. इस कड़ी में पढ़ें पंकज कुमार पाठक के द्वारा लिखी टाना भगत के आंदोलन और संघर्ष की कहानी. कैसे अपनी मांग को लेकर लड़ते रहे टाना भगत.

अखबार में एक खबर छपी थी, टाना भगत समुदाय को अब जमीन के लिए कोई लगान नहीं देना होगा. टाना भगत समुदाय की मांग को मानते हुए मुख्यमंत्री रघुवर दास ने यह आदेश भू-राजस्व सचिव को दिया. लगान की रसीद एक रुपये में कटती थी. इसे बंद कर बेलगान रसीद काटा जाये. यह खबर आपने पढ़ी होगी, खबर पर ध्यान कम गया होगा लेकिन इस मांग के पीछे भी आंदोलन है, रणनीति है, संघर्ष है. टाना भगत की इस मांग को सरकार ने माना है लेकिन क्या आप इस आंदोलन के पीछे की कहानी जानते हैं ?

गांधी के सपने और उनकी जीवनशैली को जीने वाले टाना भगत बेहद साधारण और चमक – धमक से दूर रहते हैं. उनका विरोध, आंदोलन भी साधारण और मीडिया से दूर रहता है. गांधी के राह पर चल रहे टाना भगत की मांग राज्य सरकार ने स्वीकार कर ली. यह आंदोलन कब चरम पर था ? इसकी चर्चा बहुत कम क्यों हुई. आंदोलन सफल हुआ तो इसके पीछे का संघर्ष क्यो दरकिनार कर दिया. झारखंड के बनने की कहानी में टाना भगत का जिक्र करना बेहद जरूरी है. टाना भगत लगान माफ करने की मांग को लेकर जब चर्चा करते हैं, तो इतिहास का जिक्र आ ही जाता है. टाना भगत बताते हैं कि कैसे उनके विरोध ने अंग्रेजों को पीछे हटने पर मजबूर किया . अपने हक की लड़ाई लड़ रहे टाना भगत बेहद शांत और उग्र आंदोलन से दूर रहे, अपनी मांग को लेकर छोटी- छोटी बैठक आयोजित करते रहे. कोई हंगामा नहीं, विरोध भी तो गांधी की प्रतिमा के नीचे चुपचाप.
ना मीडियावालों का जमावड़ा, ना प्रेस रिलीज. गांधी की प्रतिमा के नीचे बैठे चुपचाप टाना भगत पर जब हमारी नजर पड़ी तो हम रुक गये, बैठक में हम भी सबसे पीछे बैठे उन्हें सुनते रहे. अपनी इस मांग को लेकर टाना भगत आगे की योजना बना रहे थे . अपनी चर्चा में वह झारखंड स्थापना दिवस में विरोध ना करने और किसी भी ऐसे तरह का विरोध जिससे आम लोगों को परेशानी हो, उससे दूर रहने का फैसला ले रहे थे. उनके विरोध का तरीका बताता है कि वह किस तरह दूसरों से अलग हैं.
टाना भगत का यह आंदोलन पूरी प्लानिंग के साथ नहीं था. ऐसा भी नहीं था कि इस आंदोलन में राज्यभर के टाना भगत एक साथ जमा हो जाते थे. खेती- बारी घर छोड़कर गांव से निकलकर रांची आना सभी के लिए असंभव था लेकिन इस आंदोलन में सभी एकजुट थे.अब उनकी मांग पूरी हो चुकी है लेकिन यह झारखंड के स्थापना दिवस पर शुरू हुई सीरीज का अहम हिस्सा है. हम टाना भगत के साथ हुई बातचीत को आप तक इसलिए पहुंचा रहे हैं, हमने यह कड़ी शुरू की थी कि झारखंड के विकास को समझ सकें. झारखंड के सफर को समझने के लिए टाना भगत को भी समझना होगा. समझना होगा कि कैसे झारखंड के गौरव से रिश्ता रखने वाले टाना भगत अपनी मांग के लिए लड़े, बेहद खामोशी से आगे बढ़ते रहे, योजना बनाते रहे और अपनी मांग पर सरकार को विचार करने के लिए मजबूर करते रहे और जीते.
इस बैठक में टाना भगत ने कहा, कैसे टाना भगतो को सिर्फ आश्वासन दिया गया. इस आश्वासन पर कोई काम नहीं हुआ, सरकार ने टाना भगत पर एक रूपये का टोकन लगाया गया. हम इस फैसले का विरोध कर रहे हैं. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अरोग्य भवन में कई घोषणाएं की थी इस पर भी कोई फैसला नहीं हुआ.
हम महात्मा गांधी के राह पर चलने वाले हैं. हम उनके विचारों पर चलते हैं. हमारी कई मांगें हैं लेकिन हम मांस, मदिरा, हिंसा के विरोधी हैं. हमारी अपनी कई समस्याएं हैं हमारे संगठन के पास पैसा नहीं है फसल बेचते हैं तो खाते हैं और उसी से कुछ पैसा बचाकर रांची आते हैं, बैठक करते हैं. समाज की चिंता करते हैं.
धरती तो सबके लिए है , इसे किसी ने नहीं बनाया. यह सभी को जीने का अधिकार है. टाना भगत अपने साथ जतरा टाना भगत का लिखा एक नोट लेकर चलते हैं, जिसमें उनके अधिकार और इतिहास का जिक्र है. हमारी जमीन पर हमारा अधिकार है. हमारी मांग पूरी की जाए हम एक रुपये का टोकन क्यों दें, हम अग्रेंजों को कुछ नहीं दिया, हमारी मांग स्वराज की थी.. अब क्यों पैसे दें ?. हमारी पहचान खेती है.
अगर हमारी मांग नहीं मानी गयी तो हम आंदोलन करेंगे. हमारे पुरखे लड़े हैं हम जेल जायेंगे, हम बैठेंगे तो आंदोलन लेकर उठेंगे. जब हमने पूछा कि क्या आप स्थापना दिवस के समारोह में हिस्सा लेंगे? इस सवाल पर टाना भगत ने जवाब दिया, जगह मिलेगा, तो जरूर शामिल होंगे.
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