रांची : मोबाइल थिएटर 25 से प्रखंडों में जायेगा फिल्मों के साथ होगी बाल विवाह पर चर्चा

Updated at : 24 Nov 2018 9:04 AM (IST)
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रांची : मोबाइल थिएटर 25 से प्रखंडों में जायेगा फिल्मों के साथ होगी बाल विवाह पर चर्चा

रांची : मानवाधिकार व महिला मुद्दों पर काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्था ‘ब्रेकथ्रू’ वातानुकूलित व डॉल्बी साउंड से सुसज्जित चलते-फिरते थिएटर के माध्यम से बाल विवाह के मुद्दे पर समुदाय को जागरूक करेगी़ यह वातानुकूलित मोबाइल थिएटर 25 नवंबर से 18 दिसंबर तक रांची के नगड़ी, सिल्ली, अनगड़ा, नामकुम, बेड़ो व कांके प्रखंड के 12 स्थानों […]

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रांची : मानवाधिकार व महिला मुद्दों पर काम करनेवाली स्वयंसेवी संस्था ‘ब्रेकथ्रू’ वातानुकूलित व डॉल्बी साउंड से सुसज्जित चलते-फिरते थिएटर के माध्यम से बाल विवाह के मुद्दे पर समुदाय को जागरूक करेगी़
यह वातानुकूलित मोबाइल थिएटर 25 नवंबर से 18 दिसंबर तक रांची के नगड़ी, सिल्ली, अनगड़ा, नामकुम, बेड़ो व कांके प्रखंड के 12 स्थानों पर फिल्में दिखायेगा. बालालौंग, नगड़ी, पतरातू, कुच्चू, जोन्हा, राजाउलातू, डुगंरी, दिघिया, केसा, तूको व पिठोरिया राजस्व ग्रामों को कवर किया जायेगा़ इस बाबत जानकारी देते हुए ब्रेकथ्रू की निदेशक उर्वशी गांधी ने कहा कि फिल्में बदलाव का संदेश देने के लिए एक प्रभावी माध्यम भी हैं.
इसी को ध्यान में रखते हुए हम मोबाइल थिएटर में फिल्में दिखा कर बाल विवाह, लैंगिक भेदभाव, यौनिक हिंसा व घरेलू हिंसा जैसे प्रासंगिक मुद्दों पर चर्चा करेंगे़ साथ ही महिला मुद्दों से जुड़ी फिल्में ‘रश्मि मैट्रिक पास’ व ‘सीक्रेट सुपर स्टार’ फिल्में भी दिखायेंगे़ इस थिएटर एक साथ लगभग में 120 लोग फिल्म देख सकते हैं.
झारखंड में 38 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले : ब्रेकथ्रू की निदेशक उर्वशी गांधी ने बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 के आंकड़ों के अनुसार झारखंड में 38 फीसदी लड़कियों का विवाह 18 साल से पहले हो जाता है़
बाल विवाह की वजह से लड़कियों पर घरेलू हिंसा की संभावना बढ़ जाती है़ 30 फीसदी महिलाओं को शारीरिक हिंसा व 31 फीसदी को शारीरिक और यौनिक हिंसा का सामना करना पड़ता है़
65 फीसदी महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं. स्कूलों में टॉयलेट न होने से लड़कियों का ड्रॉप आउट रेट भी उम्र बढ़ने के साथ बढ़ जाता है़ 15 से 25 आयु वर्ग की 73 फीसदी लड़कियां अब भी माहवारी के दौरान कपड़े का इस्तेमाल करती हैं, जबकि सिर्फ 38 फीसदी ही सैनेटरी पैड का उपयोग करती हैं. इस तस्वीर को बदलने के लिए सबको मिल कर काम करने की जरूरत है़
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