रांची : मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, महाधिवक्ता के परामर्श और निर्णय की न्यायिक जांच हो : सरयू राय

Updated at : 23 Nov 2018 6:50 AM (IST)
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रांची : मुख्यमंत्री को लिखा पत्र, महाधिवक्ता के परामर्श और निर्णय की न्यायिक जांच हो : सरयू राय

रांची : मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर महाधिवक्ता द्वारा राज्य सरकार को दिये गये परामर्श और निर्णय की न्यायिक जांच कराने की मांग की है़ श्री राय ने पत्र में कहा है कि उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश को जांच का जिम्मा सौंपा जाये़ इससे खान विभाग के मामले में महाधिवक्ता […]

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रांची : मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर महाधिवक्ता द्वारा राज्य सरकार को दिये गये परामर्श और निर्णय की न्यायिक जांच कराने की मांग की है़ श्री राय ने पत्र में कहा है कि उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीश को जांच का जिम्मा सौंपा जाये़ इससे खान विभाग के मामले में महाधिवक्ता के तर्क, वर्तमान व पूर्ववर्ती विभागीय सचिव द्वारा दिये गये परामर्श व उनके द्वारा लिये गये निर्णय की न्यायिक जांच होने से दूध का दूध और पानी का पानी हो जायेगा़
मैं आज भी अपनी बात पर अडिग हूं: मंत्री ने पत्र में कहा है कि 28 अक्तूबर को पत्र लिख कर कहा था कि महाधिवक्ता का पद की गरिमा के अनुरूप न्यायिक आचरण नहीं होने के कारण उन्हें पद मुक्त किया जाये.
इसके बाद 30 अक्तूबर को महाधिवक्ता ने कहा कि उन्होंने जो भी किया है, वह अपने विवेक और राज्य हित में किया है़ श्री राय ने कहा कि इस संदर्भ में स्पष्ट करना है कि मैंने पद मुक्त करने का जो अनुरोध किया था, वह सोच-विचार किया है़ मैंने विषय वस्तु का गहन अध्ययन के उपरांत कहा था़ मैंने महाधिवक्ता को लेकर जिन बिंदुओं पर ध्यान आकृष्ट किया था, उस पर आज भी अडिग हू़ं मेरे तथ्य पूर्णत: तथ्यपरक है़ं मंत्री ने कहा है कि अफसोस है कि तीन वर्षों में कई बार खान विभाग के सचिव का ध्यान विभाग में चल रही अनियमितताओं की ओर खींचा था़ लेकिन अनियमितता बरतने का सिलसिला जारी है़
सचिव यदि नियम-कानून और तथ्य की अनदेखी करते हैं, तो राज्य को भारी नुकसान उठाना पड़ता है़ श्री राय ने कहा कि महाधिवक्ता द्वारा कोर्ट में प्रस्तुत कोई तर्क विभागीय नियम या तथ्य से मेल नहीं खाता है, तो सचिव का दायित्व है कि वे उसे ठीक करे़ं इस बारे में सरकार के सामने वस्तु स्थिति को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करे़ं लेकिन विगत वर्षों में ऐसा नहीं हुआ है़ कई मामले में महाधिवक्ता सरकार और कोर्ट के मंतव्याें को यथास्थान सही संदर्भ में प्रस्तुत नहीं करते है़ं वहीं विभागीय सचिव इस पर चुप रहते है़ं इससे सरकार के कार्य संस्कृति पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है़
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