रांची : भाषाओं के संरक्षण, संवर्द्धन में लिपि की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण : राज्यपाल

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Jul 2018 7:49 AM

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सेंट्रल लाइब्रेरी में ओल चिकी लिपि पर सात दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन रांची : राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ओल चिकी लिपि समृद्ध भाषा संताली की लिपि है़ यह भाषा सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल, ओड़िशा जैसे देश के अन्य राज्य व बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आदि अन्य देशों में भी बोली […]

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सेंट्रल लाइब्रेरी में ओल चिकी लिपि पर सात दिवसीय कार्यशाला का उद्घाटन
रांची : राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि ओल चिकी लिपि समृद्ध भाषा संताली की लिपि है़ यह भाषा सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है, बल्कि बंगाल, ओड़िशा जैसे देश के अन्य राज्य व बांग्लादेश, नेपाल, भूटान आदि अन्य देशों में भी बोली जाती है़ करोड़ों लोग इस भाषा से परिचित हैं.
पूर्व में इस भाषा को बंगाली, देवनागरी, उड़िया या रोमन लिपि में लिखा जाता था, जो इस भाषा के समुचित विकास के लिए पर्याप्त नहीं था़ विभिन्न भाषाओं की अपनी लिपि होनी चाहिए. भाषाओं के संरक्षण, संवर्द्धन व सुव्यवस्थित करने के दृष्टिकोण से विभिन्न भाषाओं की कृतियों की अपनी लिपि में अंतरित करना भी महत्वपूर्ण है़ वे इंदिरा गांधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स के रीजनल सेंटर रांची (आइजीएनसीए-आरआरसी) व रांची विश्वविद्यालय द्वारा सेंट्रल लाइब्रेरी में आयोजित ओल चिकी लिपि कार्यशाला के उदघाटन सत्र को संबोधित कर रही थीं.
मानव सभ्यता के विकास में वाणी के बाद लेखन का सर्वाधिक महत्व
मानव के महान अाविष्कारों में लिपि सर्वोपरि
उन्होंने कहा कि लिपि का शाब्दिक अर्थ लिखित या चित्रित करना है़ ध्वनियों को लिखने के लिए जिन चिह्नों का प्रयोग किया जाता है, वही लिपि है़ मानव के महान अविष्कारों में लिपि का स्थान सर्वोपरि है़ मानव सभ्यता के विकास में, वाणी के बाद लेखन का सर्वाधिक महत्व है़
मानव का बहुमुखी विकास इस वाणी को लिपिबद्ध करने की कला के कारण ही हुआ़ मुंह से बोले गये शब्द या हाव-भाव से व्यक्त किये गये विचार चिरस्थायी नहीं रहते़ लिपि ऐसे प्रतीक चिह्नों का संयोजन है, जिनके द्वारा श्रव्य भाषा को दृष्टिगोचर बनाया जाता है़ सुनी या कही हुई बात केवल उसी समय और उसी स्थान पर उपयोगी होती है़ संसार की बहुत सी लुप्त प्राय सभ्यताओं के बारे में हम इसीलिए बहुत कुछ जान सके हैं, क्योंकि वे अपने बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ छोड़ गये़
जन्म से नहीं, कर्म से पंडित थे पं रघुनाथ मुर्मू
उन्होंने कहा कि ओल चिकी लिपि के आविष्कार का श्रेय पंडित रघुनाथ मुर्मू को है, जिन्होंने 1925 में इसका आविष्कार किया़ उन्होंने महसूस किया था कि समृद्ध सांस्कृतिक विरासत व परंपरा के साथ ही संथालों की भाषा को बनाए रखने, बढ़ावा देने के लिए एक अलग लिपि की आवश्यकता है़
अाविष्कार के बाद उन्होंने इसी लिपि में अपने नाटकों की रचना की़ तब से आज तक वे एक बड़े सांस्कृतिक व्यक्ति व संताली सामाजिक-सांस्कृतिक एकता के प्रतीक रहे हैं. उन्होंने 1977 में झाड़ग्राम के बेताकुंदरीडाही गांव में एक संताली विश्वविद्यालय का शिलान्यास किया था़ वे कहते थे कि यदि आप अपनी भाषा, संस्कृति, लिपि व धर्म भूल जायेंगे, तो आपका अस्तित्व भी समाप्त हो जायेगा़ वे जन्म से नहीं, कर्म से पंडित थे़
संताली भाषा के लिए वाजपेयी से भी मिली थीं
राज्यपाल द्राैपदी मुर्मू ने कहा कि वे जब ओड़िशा से विधायक
थीं, तो इस भाषा के विकास के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिली थीं. उनसे कहा था कि संताली भाषा दुनिया की श्रेष्ठ भाषाओं में से एक है़ लिहाजा, संथाली सभ्यता व संस्कृति पर शोध करने की आवश्यकता है़ अपनी सभ्यता को बचाने के लिए स्वयं ही प्रयास करना होगा, कोई इसे बचाने के लिए बाहर से नहीं आयेगा़
अपनी लिपि में लिखने होंगे उत्तर : कुलपति
रांची : विवि के वीसी प्रो रमेश पांडेय ने कहा कि राज्यपाल जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं के विकास के लिए प्रयत्नशील रही हैं. उम्मीद है कि जल्द ही सभी जनजातीय व क्षेत्रीय भाषाओं के स्वतंत्र विभाग होंगे़ इस विभाग को सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के रूप में विकसित करने में राज्यपाल की भूमिका अहम रही है़ विभाग का नया भवन छह महीने में बन जायेगा़
कुलाधिपति ने निर्देश दिया है कि परीक्षाओं के उत्तर उन्हीं भाषाओं में लिखना उचित होगा़ डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि के वीसी डॉ सत्यनारायण मुंडा ने कहा कि इस लिपि का आविष्कार सही उच्चारण, सही चीजों को सही रूप में लिपिबद्ध करने के दृष्टिकाेण से हुआ है़ हमारी संपदाओं को बचाने की जरूरत है़ एसपी कॉलेज दुमका के पूर्व प्राचार्य डॉ वीएन झा ने कहा कि संथाल समाज का योगदान भारत में मानव विकास के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है़ कृषि की अवधारणा, कपास के आविष्कार आदि में उनके पूर्वजों की महत्वपूर्ण भूमिका है़
आइएनजीसीए के क्षेत्रीय निदेशक डॉ बच्चन कुमार ने भी विचार रखे़ संचालन प्रो कमल कुमार बोस ने किया़ मौके पर पद्मश्री मुकुंद नायक, डॉ त्रिवेणीनाथ साहू, डॉ आइके चौधरी, डॉ केसी टुडू, महादेव टोप्पो, राकेश पांडेय मौजूद थे़ यह कार्यशाला 27 जुलाई से एक अगस्त तक आइजीएनसीए-आरआरसी कैंपस में दिन के 11 से एक बजे तक होगी़
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