झारखंड में जरूरत है भूख पर राजनीति की

Updated at : 13 Feb 2018 8:45 AM (IST)
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झारखंड में जरूरत है भूख पर राजनीति की

II सिराज दत्ता II राज्य की 31.6 प्रतिशत महिलाओं एवं 23.8 प्रतिशत पुरुषों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम झारखंड में भूख से मौत का मामला हाल के दिनों में कई बार उठा है हालांकि हर बार सरकार इसे नकार देती है. हाल में आये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार […]

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II सिराज दत्ता II
राज्य की 31.6 प्रतिशत महिलाओं एवं 23.8 प्रतिशत पुरुषों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम
झारखंड में भूख से मौत का मामला हाल के दिनों में कई बार उठा है हालांकि हर बार सरकार इसे नकार देती है. हाल में आये राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2015-16 की रिपोर्ट के अनुसार झारखंड की 31.6 प्रतिशत महिलाओं एवं 23.8 प्रतिशत पुरुषों का बॉडी मास इंडेक्स सामान्य से कम है.
ऐसे परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा कानून व योजनाएं जैसे जन वितरण प्रणाली, पेंशन एवं मनरेगा जीवनरेखा समान होती है. झारखंड में पिछले कुछ वर्षों में जिन परिवारों को मनरेगा में काम मिल पाया है, उन्हें प्रति वर्ष औसतन केवल 40 दिनों का ही रोजगार मिला है.
राज्य के कम से कम 14.5 लाख वृद्ध नागरिकों (2011 की जनगणना के अनुसार) को सामाजिक सुरक्षा पेंशन नहीं मिल रही है. जिन्हें मिल भी रही है, उन्हें न तो समय पर मिलती है और न ही पर्याप्त राशि (केवल 600 रुपये प्रति माह) मिलती है. झारखंड में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू होने के बाद राज्य के 86 प्रतिशत ग्रामीण परिवार राशन के लिए हकदार हुए, लेकिन 2016 से जन वितरण प्रणाली में आधार आधारित बायोमेट्रिक सत्यापन की प्रणाली लागू करने के कारण बड़े पैमाने पर लोग राशन से वंचित हो रहे हैं.
सरकार के अपने आंकड़ों एवं कुछ स्वतंत्र शोधकर्ताओं के अनुसार बायोमेट्रिक सत्यापन की व्यवस्था के कारण कम से कम 10-20 प्रतिशत परिवार राशन से वंचित हो रहे हैं. साथ ही ऐसे राशन कार्ड जो आधार से नहीं जुड़े हैं, उन्हें फर्जी अथवा डुप्लीकेट मानकर रद्द कर दिया गया है़ (सरकार के अनुसार 11.6 लाख कार्ड रद्द किये गये हैं).
ऐसी परिस्थति में यह आशा थी कि झारखंड में भुखमरी की समस्या को समाप्त करना राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होगी. लेकिन भूख से हुई मौतों पर राज्य सरकार की प्रतिक्रिया और हाल में पेश किया गया बजट कुछ और ही संकेत देते हैं. सरकार के अनुसार ये मौतें मलेरिया, कालाजार जैसी बीमारियों की वजह से हुई है. खाद्य आपूर्ति मंत्री समय-समय पर जन वितरण प्रणाली में दाल व खाद्य तेल शामिल करने के वादे करते हैं, लेकन बजट में इन पौष्टिक पदार्थों के लिए कोई प्रावधान नहीं है. वृद्ध सामाजिक सुरक्षा पेंशन के बजट को पिछले वर्ष से भी कम कर दिया गया है.
झारखंड में विपक्षी दलों ने पहली बार भुखमरी के सवाल को जोर-शोर से विधानसभा व मीडिया के समक्ष कई दिनों तक लगातार उठाया. साथ ही कई दलों ने राशन, मनरेगा व पेंशन की समस्यों पर प्रखंड व जिला स्तरों पर धरना-प्रदर्शन भी किया. लेकिन समय के साथ विपक्ष का ध्यान इन मुद्दों पर कमजोर होता दिख रहा है.
आज झारखंड की जरूरत भूख पर व्यापक राजनीति की है. यह देखना है कि विपक्षी दल इन मुद्दों पर गांव से राज्य तक लंबी लड़ाई और राजनीति के लिए तैयार हैं कि नहीं. यह भी देखना है कि अगले विधानसभा चुनाव में लोग भुखमरी और जन कल्याणकारी योजनाओं के सवालों पर पक्ष व विपक्ष से जवाबदेही मांगते हैं या नहीं.
(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और ये उनके निजी विचार हैं)
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