फिर एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रमेंद्र

Published at :29 Feb 2016 12:29 AM (IST)
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फिर एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रमेंद्र

तमिलनाडु के कोयंबटूर में एटक का राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न राष्ट्रीय कार्यसमिति में झारखंड के लखनलाल सहित 14 लोग भुरकुंडा : पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार लगातार दूसरी बार मजदूर संगठन एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिये गये हैं. तमिलनाडु के कोयंबटूर में 25 से 28 फरवरी तक आयोजित 41वें तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें अध्यक्ष […]

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तमिलनाडु के कोयंबटूर में एटक का राष्ट्रीय सम्मेलन संपन्न
राष्ट्रीय कार्यसमिति में झारखंड के लखनलाल सहित 14 लोग
भुरकुंडा : पूर्व सांसद रमेंद्र कुमार लगातार दूसरी बार मजदूर संगठन एटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिये गये हैं. तमिलनाडु के कोयंबटूर में 25 से 28 फरवरी तक आयोजित 41वें तीन दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें अध्यक्ष चुना गया. उनके साथ संगठन के महासचिव गुरुदास दासगुप्ता को चुना गया है.
इस सम्मेलन में देश भर से 27 हजार एटक नेता व कार्यकर्ताओं ने शिरकत की थी. इसके अलावा 365 सदस्यीय राष्ट्रीय समिति में झारखंड से एटक के प्रखर मजदूर नेता लखनलाल महतो, ओमप्रकाश सिंह सहित 14 लोग शामिल किये गये हैं. वहीं कोयला क्षेत्र के लिए बनी कमेटी में झारखंड के सात सदस्यों को जगह दिया गया है. जिसमें लखनलाल, विंध्याचल बेदिया, बालेश्वर महतो, नरेश मंडल आदि शामिल हैं.
रमेंद्र कुमार इसके पूर्व वर्ष 2012 में त्रिपुरा में आयोजित सम्मेलन में पहली बार राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे. इनके चयन पर कोयलांचल क्षेत्र में हर्ष का माहौल है. रमेंद्र सयाल के रहने वाले हैं. इसलिए खास कर इस क्षेत्र में उल्लास देखा जा रहा है. जगह-जगह मिठाइयां बांटी जा रही है.
एक बार सांसद, तीन बार रह चुके हैं विधायक : रमेंद्र कुमार की पूर्व से राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग पहचान रही है. आजीवन वामपंथी विचारधारा के द्योतक रहे रमेंद्र कुमार बेगूसराय से 1991 में सीपीआइ के सांसद चुने गये. इसके पूर्व 1980 से 1995 तक वे लगातार तीन बार बड़कागांव विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहें. एकीकृत बिहार में विधानसभा में उनकी आवाज हमेशा गूंजती रही.
मजदूरों, किसानों से लेकर गरीबों-दलितों के हित के मुद्दे उन्होंने उठाये और उसका लाभ उन्हें दिलाया. सांसद रहते हुए भी चंद दिनों में उन्होंने लोकसभा में भी अपने प्रखर वक्तव्य से पहचान कायम की थी. कोयला क्षेत्र में तो उनकी एक अलग पहचान है. प्रतिद्वंदी ट्रेड यूनियन के नेता भी उनके कायल हैं. खास कर ठेका मजदूरों के लिए तो वे मसीहा जैसे हैं. ठेका मजदूरों के वेतन विसंगती को सबसे पहले उन्होंने ही उठाया. जिसका लाभ आज ठेका मजदूरों को मिल रहा है.
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