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झारखंड की राजनीति का फ्लैश बैक : कोयला कारोबार करने आये वीरेंद्र पांडेय बन गये मांडू विधायक

Updated at : 21 Nov 2019 7:01 AM (IST)
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झारखंड की राजनीति का फ्लैश बैक : कोयला कारोबार करने आये वीरेंद्र पांडेय बन गये मांडू विधायक

अजय/धनेश्वर गिद्दी (हजारीबाग) : मांडू विधानसभा क्षेत्र में लगभग एक दशक से अधिक रामगढ़ राज परिवार का राजनीतिक दबदबा रहा है. वर्ष 1957 से लेकर 1969 तक मांडू विधानसभा क्षेत्र से रामगढ़ राज परिवार की पार्टी के मोती राम, रघुनंदन प्रसाद, बलवंतनाथ सिंह, राजा कामाख्या नारायण सिंह विजयी रहे. वर्ष 1972 के विधानसभा चुनाव में […]

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अजय/धनेश्वर

गिद्दी (हजारीबाग) : मांडू विधानसभा क्षेत्र में लगभग एक दशक से अधिक रामगढ़ राज परिवार का राजनीतिक दबदबा रहा है. वर्ष 1957 से लेकर 1969 तक मांडू विधानसभा क्षेत्र से रामगढ़ राज परिवार की पार्टी के मोती राम, रघुनंदन प्रसाद, बलवंतनाथ सिंह, राजा कामाख्या नारायण सिंह विजयी रहे.

वर्ष 1972 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के वीरेंद्र कुमार पांडेय ने जीत हासिल की थी. उसके बाद से कांग्रेस आज तक जीत हासिल नहीं कर पायी है. वीरेंद्र कुमार पांडेय ने जिस ढंग से कांग्रेस से टिकट और जीत हासिल की थी, वह किसी फिल्मी ड्रामा से कम नहीं है. वीरेंद्र कुमार पांडेय बिहार के रहनेवाले थे. वर्ष 1969-70 के आसपास वे कुछ पैसा लेकर कोयला का कारोबार करने के उद्देश्य से कुजू पहुंचे थे. यहां पर कोयला कारोबारी एसके बनर्जी से उनकी मुलाकात हुई.

वीरेंद्र कुमार पांडेय ने उनसे कोयला कारोबार करने की इच्छा जतायी. एसके बनर्जी के यहां वे किराये के मकान में रहने लगे. एसके बनर्जी से ही उन्होंने कोयला कारोबार का मंत्र सीखा. गिद्दी क्षेत्र के बुंडू तथा कुजू क्षेत्र में कोयला कारोबार करने लगे. इसी दौरान उन्होंने मांडू से विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की योजना बनायी. इसके लिए मांडू से पटना तक कांग्रेस के प्रमुख नेताओं से अपनी राजनीतिक पैठ तथा मांडू क्षेत्र में राजनीतिक जमीन तैयार की. वीरेंद्र कुमार पांडेय किसी तरह कांग्रेस का टिकट लेने में कामयाब हो गये. उनके पास चुनाव लड़ने के लिए पैसे नहीं थे. एसके बनर्जी ने उन्हें आर्थिक सहयोग किया.

किसी को उनकी जीत की उम्मीद नहीं थी, लेकिन वीरेंद्र कुमार पांडेय ने करिश्माई ढंग से भारतीय जनसंघ के शालीग्राम सिंह को 6927 मतों से पराजित कर दिया और वे मांडू के विधायक बन गये. वीरेंद्र कुमार पांडेय की जीत से रामगढ़ राज परिवार का राजनीतिक दबदबा का अंत हो गया. 1972 के चुनाव के बाद वीरेंद्र कुमार पांडेय चुनाव में खड़े नहीं हुए और न इसके बाद कांग्रेस पार्टी ही जीत हासिल कर पायी है.

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