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झारखंड : पलामू में कई नदियों के सूखने से जलसंकट गहराया, करोड़ों की ग्रामीण जलापूर्ति योजना बेकार

Updated at : 16 Apr 2023 6:48 PM (IST)
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झारखंड : पलामू में कई नदियों के सूखने से जलसंकट गहराया, करोड़ों की ग्रामीण जलापूर्ति योजना बेकार

पलामू में कई नदियों के सूखने से जलसंकट गहरा गया है. जिले में अधिकांश जलापूर्ति योजना नदियों पर ही निर्भर है. ऐसे में बारिश नहीं होने से जलस्तर तेजी से गिरा है. इससे करोड़ों की ग्रामीण जलापूर्ति योजना बेकार हो गयी है.

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मेदिनीनगर, चंद्रशेखर सिंह : पलामू जिले में सोन, कोयल, अमानत, औरंगा, मलय, बटाने, सदाबह, जिंजोई आदि नदिया बहती हैं. इन्हीं नदियों पर यहां की पेयजलापूर्ति निर्भर है. लेकिन, हालात ये है कि सोन नदी का जलस्तर नीचे चला गया है. कोयल नदी सूख चली है. अमानत और औरंगा पूरी तरह सूख चुकी हैं. पलामू के अधिकांश छोटे नदी-नाले अक्तूबर में ही सूख चुके हैं. आहर, पोखर और तालाब इस बार खुद प्यासे हैं. इससे करोड़ों की ग्रामीण जलापूर्ति योजना बेकार हो गयी है.

कई नदियां सूखी

मेदिनीनगर नगर निगम का बड़ा भाग कोयल नदी से जलापूर्ति योजना पर निर्भर है. बारिश नहीं होने कारण नदियों का जलस्तर तेजी से गिरा है. मार्च में बारिश होने से नदी में पानी का बहाव देखने को मिला, लेकिन मौसम में अचानक बदलाव होने के कारण तापमान बढ़ने लगा और नदियां सूख गयीं. गर्मी में कोयल नदी में निगम कर्मियों द्वारा जेसीबी के माध्यम से चैनल की खुदाई कर पानी संग्रह किया जाता है. लेकिन, इससे निगम वासियों को निजात नहीं मिल पा रही है.

ड्राइजोन इलाकों में टैंकर से जलापूर्ति

मेदिनीनगर में पेयजलापूर्ति की स्थिति बेहतर नहीं है. शहर के ड्राइजोन इलाकों में टैंकर से जलापूर्ति शुरू की गयी. लेकिन, लोगों को जितना पानी की जरूरत है. वह नहीं मिल पा रहा है. जलस्तर नीचे जाने से सैकड़ों चापाकल डेड हो चुके हैं. मेदिनीनगर शहरी क्षेत्र के इलाकों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों के भी कई इलाके ड्राइजोन बन चुके हैं. जलस्रोतों को बचाने के प्रति आम लोग गंभीर नहीं है. इसकी चिंता जनप्रतिनिधियों को भी नहीं है. जमीन माफिया आहर-पोखर को भी समतल कर बेच डाले. अगर यही हाल रहा, तो पांच वर्षों में पेयजल की समस्या विकट हो जायेगी.

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कोयल नदी का अस्तित्व मिटाने में लगे हैं बालू माफिया

मेदिनीनगर शहर की लाइफ लाइन कोयल नदी खेल का मैदान बन चुकी है. बालू माफिया नदी का अस्तित्व ही मिटाने में लगे हैं. नदी से अवैध रूप से बालू का उठाव होने के कारण पूरे नदी में मिट्टी दिख रही है. पलामू में जल संग्रहण के लिए सिंचाई विभाग, भूमि संरक्षण विभाग द्वारा तालाब, आहर व चेकडैम के निर्माण पर अरबों रुपये खर्च किये जा चुके हैं, लेकिन पानी संग्रह नहीं हो पाया है. कोयल नदी बीयर बनाने के लिए सिर्फ राजनीति होती रही है. पलामू में जल संग्रहण के लिए योजनाओं को कमाई का साधन बना लिया गया है. पंचायतों में लगाये गये सोलर जलमीनार सिर्फ दिखावे के लिए रह गये हैं. हुसैनाबाद व छतरपुर अनुमंडल मुख्यालय में सोन नदी से पानी लाने की तैयारी हो रही है. इसके लिए काम चल रहा है. इस योजना में करोड़ो रुपये खर्च किये जा रहे हैं. लेकिन, चार वर्ष से अधिक समय गुजर जाने के बाद भी जलमीनार का काम पूरा नहीं हुआ. हुसैनाबाद से सोन नदी की दूरी पांच किलोमीटर है, जबकि छतरपुर से करीब 30 किलोमीटर दूरी से पानी लाने की योजना है. पेयजलापूर्ति के लिए मलय नदी पर सतबरवा व लेस्लीगंज प्रखंड का इलाका निर्भर है. ग्रामीणों के अनुसार, ऊपरी भाग में मलय डैम के होने के कारण सतबरवा के इलाके में जलस्तर बना रहता है.

जलापूर्ति योजनाओं की स्थिति

– नगर निगम के बेलवाटिका स्थित पंपू कल, सुदना, बारालोटा, चैनपुर क्षेत्र में कोयल नदी में स्थापित जलापूर्ति योजना से मेदिनीनगर नगर निगम की डेढ़ लाख से अधिक की आबादी टिकी है

– पाटन की बेलाही ग्रामीण जलापूर्ति योजना 56 लाख खर्च होने के बाद भी डेड हो चुकी है. इससे छह पंचायतों में पेयजलापूर्ति करनी थी

– पांकी में प्रखंड कार्यालय के समीप डीप बोरिंग से अनियमित जलापूर्ति की जाती है

– हैदरनगर में जलापूर्ति डीप बोरिंग के माध्यम से बाजार क्षेत्र में की जाती है. यह अस्थायी समाधान है

– मोहम्मदगंज मुख्यालय में जलापूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है

– विश्रामपुर नगर पर्षद क्षेत्र में नियमित पेयजलापूर्ति नहीं होती है

– हुसैनाबाद और छतरपुर अनुमंडल के विभिन्न गांवों में सोन नदी से पानी लाने की योजना है. इस योजना पर 56 करोड़ खर्च किया जा रहा है. तमिलनाडु की कंपनी कार्य कर रही है

– पांडू में नदी पूरी तरह सूख गयी है. जलापूर्ति बंद है

– उंटारी रोड, नावा बाजार, पड़वा, रामगढ़, मनातू, तरहसी, नौडीहा बाजार मुख्यालय में जलापूर्ति की नियमित व्यवस्था नहीं है.

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