'सर... आप हमारी जगह आकर रहिए', पलामू के बच्चों की डीसी से भावुक अपील, छलका 25 साल का दर्द

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हाथ में जूते लेकर स्कूल जाते रांकी और हमीनपुर गांव के बच्चे. फोटो: प्रभात खबर

हाथ में जूते लेकर स्कूल जाते रांकी और हमीनपुर गांव के बच्चे. फोटो: प्रभात खबर

Palamu News: पलामू के रांकी और हमीनपुर गांव के बच्चों ने जर्जर सड़क, पुलिया की कमी और बरसात में कटने वाले संपर्क मार्ग को लेकर डीसी से भावुक अपील की. ग्रामीणों का कहना है कि 25 वर्षों से सड़क नहीं बनी, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य और आवागमन गंभीर रूप से प्रभावित हैं.

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पलामू से चंद्रशेखर सिंह की रिपोर्ट

Palamu News: पलामू प्रमंडलीय मुख्यालय मेदिनीनगर से पांच किलोमीटर व चैनपुर प्रखंड मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूर स्थित रांकी और हमीनपुर गांव के बच्चों का आंखों से दर्द अब आक्रोश बन गया है. जिला मुख्यालय के नाक के नीचे बसे इन गांवों में विकास की किरण आज तक नहीं पहुंच सकी है. यह समस्या सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां के निवासियों के जीवन पर भी भारी पड़ रहा है. सड़क की जर्जर स्थिति के कारण गांव में कोई भी वाहन आने को तैयार नहीं होता है. बीमारी या किसी आपातकालीन स्थिति में मरीजों को अस्पताल ले जाना एक बड़ी चुनौती है. कई बार सही समय पर वाहन न मिलने और अस्पताल पहुंचने में देरी के कारण गंभीर मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं. इस बदहाली को लेकर विशेषकर ग्रामीण महिलाओं में विधायक व मुखिया के प्रति भारी आक्रोश व्याप्त है. गांव के बच्चों का आखरी उम्मीद पलामू डीसी से है. उनका कहना है कि डीसी सर, सड़क बना दीजिए, हम लोग विकास कर जायेंगे, आप पावर में हैं. अगर आप भी मेरी पीड़ा नहीं सुनेंगे, तो भला कौन सुनेगा? अगर आपको हमारा दर्द समझना है, तो एक दिन हमारी जगह आकर रहिये.

बरसात में चुनौतियों से जूझते हैं लोग

रांकी और हमीनपुर गांव के बच्चों को बरसात के दिनों में कई चुनौतियों से जुझना पड़ता है. कच्ची व जर्जर सड़क के कारण कीचड़ भरा होता है. वही रानीताल डैम से निकला गया कैनाल से पानी बहता रहता है. बारिश के दिनों में काफी पानी आने के बाद पार करना मुश्किल हो जाता है. जिस जगह से लोग पार करते हैं छलका बना दिया गया है. बारिश के दिनों में लगातार पानी का बहाव होने से काई बैठ जाता है. जिसके कारण पैदल भी पार करना खतरे से खाली नहीं होता. कई लोग पिछलकर गिर जाते हैं. ग्रामीणों की माने तो नप्रतिनिधि का आश्वासन कोरा साबित हुआ है.

सपनों पर भारी गड्ढे

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 25 वर्षों से इस सड़क का निर्माण नहीं हुआ है. वर्तमान में सड़क पर सिर्फ बड़े गड्ढे और कीचड़ का नजर आता है. इस जर्जर रास्ते के बीच से नदी और नाले गुजरते हैं. पुलिया नहीं होने के कारण बरसात के चार माह इन गांवों का संपर्क प्रखंड मुख्यालय जाना मुश्किल हो जाता है. छात्र-छात्राओं का कहना है कि उनके सपने बहुत ऊंचे हैं, वे पढ़-लिखकर देश और समाज के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं. लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि जब सड़क ही नहीं होगी, तो वे स्कूल कैसे पहुंचेंगे? और जब स्कूल ही नहीं जाएंगे, तो उनका विकास कैसे होगा.

सपनों के आड़े आ रहा है सिस्टम का गड्ढा

गांव के विद्यार्थियों का कहना है कि वे पढ़-लिखकर देश और समाज का नाम रोशन करना चाहते हैं. लेकिन जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा उनके सपनों को तोड़ रही है. बच्चों का कहना है कि पिछले ढाई दशकों से इस सड़क की सुध न लेना प्रशासनिक संवेदनशीलता भी सवाल खड़ा करता है.

टापू बन जाता है इलाका, एंबुलेंस तक नहीं आती

इस सड़क के बीच से छोटी नदी और नाले गुजरते हैं, जिन पर पुलिया न होने से बारिश के दिनों में यह पूरा इलाका मुख्य मार्ग से पूरी तरह कट जाता है. सबसे भयावह स्थिति तब होती है जब कोई ग्रामीण गंभीर रूप से बीमार पड़ता है. सड़क पर सिर्फ गड्ढे और कीचड़ होने के कारण कोई भी एंबुलेंस या वाहन गांव के भीतर आने को तैयार नहीं होता. ग्रामीणों का आरोप है कि समय पर अस्पताल न पहुंच पाने के कारण अब तक कई लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

हाथ में जूते लेकर स्कूल जाते हैं बच्चे

दोनों गांव के बच्चों को स्कूल जाने के समय सड़क में कीचड़ होने के कारण नंगे पैर जाना पड़ता है. हाथ में शूज लेकर चलते हैं. प्रत्येक दिन स्कूल का ड्रेस गंदा हो जाता है. जिसके कारण महिलाएं बच्चों की गुस्से में पिटाई भी कर देती है. केंद्रीय विद्यालय में अध्यनरत ड्यूटी रानी का कहना है कि संभल के जाने के बाद भी स्कूल का ड्रेस पर कीचड़ पड़ जाता है. इसमें बच्चों की गलती क्या है.

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अब बर्दाश्त नहीं होगी अनदेखी: ग्रामीण

सड़क निर्माण की मांग को लेकर महिलाओं और युवाओं में भारी आक्रोश व्याप्त है. रोटरी स्कूल की छात्रा नंदनी कुमारी और गांव की महिला कंचन देवी सहित स्थानीय लोगों का कहना है कि वे सालों से सिर्फ खोखले आश्वासन सुन रहे हैं. अगर प्रशासन ने जल्द ही सड़क और पुल निर्माण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया, तो वे चक्का जाम और उग्र प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे.

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कुमार विश्वत सेन

लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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