लरका आंदोलन के सात जांबाजों का शहादत दिवस आज, एक गद्दारी और सात वीरों का कत्लेआम

Published by : SHAILESH AMBASHTHA Updated At : 01 Feb 2026 10:03 PM

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लरका आंदोलन के सात जांबाजों का शहादत दिवस आज, एक गद्दारी और सात वीरों का कत्लेआम

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कुड़ू़ लरका आंदोलन के प्रणेता वीर बुधु भगत और उनके सात जांबाजों ने अपने अदम्य साहस से अंग्रेजी हुकूमत की जड़ें हिला दी थीं. हलधर भगत, गिरधर भगत, बहन रुनिया, झुनिया, लोदरो उरांव और विश्वनाथ भगत जैसे वीरों ने दो वर्षों तक अंग्रेजी सेना को छकाया. उन्होंने ब्रिटिश सेना के कई आयुध डिपो को उड़ा दिया और कई कमांडरों को मार गिराया. अंग्रेजों ने इन वीरों को पकड़ने के लिए इनाम की घोषणा की थी, लेकिन वे कभी सामने से नहीं पकड़े जा सके. अंततः एक फरवरी 1857 की एक मनहूस रात को गद्दारी के कारण इन वीरों का अंत हुआ. इतिहास के पन्नों के अनुसार : एक फरवरी 1857 की रात सातों जांबाज कुड़ू के ””””जंगी बगीचा”””” में विश्राम कर रहे थे. वीर बुधु भगत उस समय दूसरी टीम के साथ थे. इसी बीच इनाम के लालच में एक आंदोलनकारी ने अंग्रेजों को गुप्त सूचना दे दी कि टिको स्थित सेना के डिपो पर हमला करने वाले क्रांतिकारी बगीचे में मौजूद हैं. सूचना मिलते ही अंग्रेजी सेना ने लाव-लश्कर के साथ जंगी बगीचा को चारों तरफ से घेर लिया. सातों आंदोलनकारियों को धोखे से पकड़ लिया गया. इनमें बुधु भगत के दो पुत्र हलधर व गिरधर और दो वीर बहनें रुनिया-झुनिया भी शामिल थीं. अमानवीय यातनाएं और कत्लेआम : पकड़े गये जांबाजों को टिको पोखराटोली स्थित ब्रिटिश कैंप ले जाया गया. वहां उनके साथ अमानवीय अत्याचार किये गये. अंततः दो फरवरी की अहले सुबह, अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए सातों वीरों को एक ही रस्सी से बांधा और ””””जोड़ा बर”””” के पेड़ के नीचे कत्लेआम कर दिया. तब से हर साल दो फरवरी को टिको पोखराटोली में इन शहीदों की याद में भव्य श्रद्धांजलि समारोह आयोजित किया जाता है. बदल रही तस्वीर, पर पर्यटन स्थल का सपना अधूरा : दशकों की उपेक्षा के बाद अब शहीद स्थल टिको पोखराटोली की तस्वीर बदल रही है. यहां अतिथि शाला भवन और पीसीसी सड़क जैसे विकास कार्य कराये गये हैं. हालांकि, इसे एक पूर्ण पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने का सपना अब भी अधूरा है. तत्कालीन मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी से लेकर अब तक कई मंत्रियों, सांसदों और विधायकों ने यहां मत्था टेका और इसे पर्यटन स्थल बनाने का आश्वासन दिया, लेकिन घोषणाएं धरातल पर नहीं उतर सकीं. स्थानीय ग्रामीण और शहीद के वंशज आज भी इस स्थल को राजकीय सम्मान और पर्यटन का दर्जा मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं.

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