परिसीमन से आदिवासी सीटों में कटौती हुई, तो होगा राजनीतिक विस्थापन : सुखदेव भगत
Published by : SHAILESH AMBASHTHA Updated At : 02 Jun 2026 9:32 PM
परिसीमन से आदिवासी सीटों में कटौती हुई, तो होगा राजनीतिक विस्थापन : सुखदेव भगत
लोहरदगा़ देश में प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों में चिंताओं का माहौल लगातार गहराता जा रहा है. इसी मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं लोहरदगा लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुखदेव भगत ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि यदि परिसीमन के नाम पर अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या में कमी की गई, तो यह आदिवासी समाज का राजनीतिक विस्थापन साबित होगा. सांसद ने कहा कि झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल चुनावी व्यवस्था का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, जल-जंगल-जमीन और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा का सबसे मजबूत माध्यम है. ऐसे में यदि परिसीमन के दौरान जनसंख्या के आधार पर आदिवासी आरक्षित सीटों को कम करने का प्रयास किया जाता है, तो इससे आदिवासी समुदाय की राजनीतिक भागीदारी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी प्रभावी भूमिका कमजोर हो जायेगी. उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज पहले से ही अपने अस्तित्व, पहचान और अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है. ऐसे समय में यदि उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी को कम किया जाता है, तो इसका दूरगामी और गंभीर प्रभाव पड़ेगा. परिसीमन को लेकर जो चर्चाएं सामने आ रही हैं, उससे आदिवासी समाज के बीच असमंजस का माहौल है. यदि इस व्यवस्था को कमजोर किया जाता है तो यह संविधान की मूल भावना के भी विपरीत होगा. सांसद ने लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी पर भरोसा जताते हुए कहा कि वे देश के वंचित, शोषित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों की आवाज को मजबूती से उठा रहे हैं. हम अपनी सभी चिंताओं और जमीनी हकीकत को उनके समक्ष रखेंगे. हमें विश्वास है कि वे इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूती से उठायेंगे. कांग्रेस पार्टी हमेशा से आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ती रही है. संसद से सड़क तक लड़ाई की चेतावनी : सांसद ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि परिसीमन प्रक्रिया के दौरान आदिवासी आरक्षित सीटों में कटौती का कोई प्रयास किया गया, तो इसका व्यापक विरोध किया जायेगा. आदिवासी समाज अपने संवैधानिक अधिकारों से समझौता करने वाला नहीं है और जरूरत पड़ने पर संसद से लेकर सड़क तक लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन किया जाएगा. यह केवल किसी एक राजनीतिक दल का मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे आदिवासी समाज के भविष्य और राजनीतिक अस्तित्व का प्रश्न है. इसलिए सभी सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों को इस विषय पर जागरूक और एकजुट रहने की आवश्यकता है.
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